यहाँ मैं उन दो आलेखों को एक साथ प्रस्तुत कर रहा हूं, जिनके नाम पर आज भी गांधी और भगत सिंह को एक-दूसरे के विरुद्ध दिखाया जाता है। ‘बम का दर्शन’ आलेख भगत सिंह के नाम है, और ‘बम की उपासना’ गांधी के नाम है।

‘बम का दर्शन’ नामक प्रकाशित दस्तावेजी आलेख के प्रारंभ में कोष्टक में यह सूचना अंकित है: (“राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान क्रांतिकारियों की निन्दा में गांधी जी ब्रिटिश सरकार से एक कदम आगे रहते थे। 23 दिसम्बर, 1929 को क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के स्तम्भ वायसराय की गाड़ी को उड़ाने का प्रयास किया, जो असफल रहा। गांधी जी ने इस घटना पर एक कटुतापूर्ण लेख ‘बम की पूजा’ लिखा, जिसमें उन्होंने वायसराय को देश का शुभचिंतक और नवयुवकों को आजादी के रास्ते में रोड़ा अटकाने वाले कहा। इसी के जवाब में “हि.प्र.स.स.” (हिन्दुस्थान प्रजातन्त्र समाजवादी सभा) की ओर से भगवती चरण वोहरा ने “बम का दर्शन” लेख लिखा, जिसका शीर्षक “हिन्दुस्थान प्रजातन्त्र समाजवादी सभा का घोषणापत्र” रखा। भगत सिंह ने जेल में इसे अन्तिम रूप दिया। 26 जनवरी, 1930 को इसे देश भर में बांटा गया। यहां प्रस्तुत है उस विस्तृत लेख का मुख्य अंश - सं.) मैंने उक्त सूचना के आधार पर गांधी के आलेख के लिए कुछ गांधीवादी मित्रों से संपर्क किया, तो यह सूचना मिली कि उनका वह लेख ‘यंग इंडिया’ (अंग्रेजी) में 2 जनवरी, 1930 के अंक में छपा था। मैंने उस लेख का हिन्दी रूपांतर प्राप्त करने की कोशिश की। मैंने मित्रों को यह भी बताया कि मैं वह लेख क्यों चाहता हूं? ‘बम का दर्शन’ दस्तावेजी आलेख के शुरू में दर्ज संपादक की टिप्पणी से मेरे पत्रकार-दिमाग में जिज्ञासा जगी कि गांधी के लिखे ‘बम की पूजा’ में ऐसा क्या है, जिसने ‘भगत सिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज’ जैसे श्रमसाध्य, अति महत्वपूर्ण और ‘आज के भारत’ के लिए प्रासंगिक सामग्री-संचयन के संपादक चमन लाल जी को यह टिप्पणी लिखनी पड़ी कि राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान क्रांतिकारियों की निन्दा में गांधी जी ब्रिटिश सरकार से एक कदम आगे रहते थे? गांधीजी का लेख कितना ‘कटुतापूर्ण’ है? क्या उसमें उन्होंने वायसराय को देश का शुभचिंतक और नवयुवकों को आजादी के रास्ते में रोड़ा अटकाने वाले कहा? मैंने ये सब सवाल जेपी के नेतृत्व में 1974 में चले बिहार आन्दोलन (संपूर्ण क्रांति आंदोलन) - जिसका प्रमुख नारा था – ‘हमला चाहे जैसा होगा, हाथ हमारा नहीं उठेगा’ - से जुड़े बिहार, मुंबई और दिल्ली के कुछ मित्रों के सामने रखे। कई मित्रों ने इतने-इतने सुझाव दिए कि उन पर अमल करना अकेले मेरे लिए असंभव नहीं, तो कठिन अवश्य है - जैसे उन्होंने मुझे 1930 के पहले और बाद की देश की राजनीतिक-सामाजिक परिस्थिति और उसके प्रति गांधी और भगत सिंह का दृष्टि-भेद, अहिंसात्मक संघर्ष और सशस्त्र-क्रांति के सिद्धांत-नीति-रणनीति, हिंसा-अहिंसा, राज्य-सत्ता, समाजवाद, समता-स्वाधीनता आदि विषयों पर गांधी और भगत सिंह के विचार-चिंतन के कुछ-कुछ अंशों आमने-सामने प्रस्तुत करने को कहा। उन्होंने ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 44वें अधिवेशन की रिपोर्ट’ भी देखने-पढ़ने की राय दी। उन्होंने कई लेखकों की किताबों की सूची भी थमाई कि मैं कुछ लिखने के पहले उन्हें देख जाऊं! बहरहाल, मैं साथियों की राय पर अमल करने का प्रयास कर रहा हूं। लेकिन इस बीच यह विचार आया कि दोनों आलेख (‘1930 - लाहौर कांग्रेस और उसके बाद के भारत’ 4-5 साल पूर्व लिखे आलेखों के कुछ अंशों के साथ) उन साथियों के पास पहुंचा दूं, जिन्होंने 1974 आंदोलन के दौरान 72 साल के युवा जेपी की लोकनायक ‘छवि’ में गांधी का ‘जोश’ और भगत सिंह का ‘होश’ समाहित देखा था ; और तब से वे अक्सर ‘संपूर्ण क्रांति’ की तस्वीर उकेरने को प्रेरित सार्वजनिक विमर्श के आयोजनों में एक साथ गांधी और भगत सिंह - दोनों की तस्वीर लगाते आ रहे हैं। हालांकि वे बीते सालों में कतिपय गांधीवादियों और भगत सिंह समर्थकों - दोनों पक्षों की नाराजगी और ऐसे आयोजनों का बहिष्कार भी झेल चुके हैं! हमारे कई युवा साथी उन आयोजनों के खट्टे-मीठे अनुभवों के आधार पर कहते हैं – “हम क्या करें! आजादी के 68 साल बाद भी गांधी और भगत सिंह के बीच सम्वादहीनता का ‘बम’ रखा हुआ है! और, पूरा परिदृश्य चैप्लिन की बोलती फिल्म ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ के शुरुआती दृश्य से मिलता-जुलता है!” आपने ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ फिल्म देखी है? उसका पहला दृश्य कुछ इस प्रकार था – ‘चैप्लिन का फिल्मी मसखरा एक तोप के पीछे लगी रस्सी को खींचता है। बैरल में सरसराहट होती है। उसके मुंह से एक गोला निकलता है। वह गोला दूर जाने की बजाय नीचे गिर जाता है। बिल्कुल नजदीक। मसखरा पास जाकर बेलनाकार बम को पीछे से देखने की कोशिश करता है। वह जैसे ही उसके पीछे जाता है, बम घूम जाता है। ऐसा कई बार होता है। अंततः मसखरा और बम एक दूसरे के पीछे गोल-गोल घूमने लगते हैं!’

बम का दर्शन - भगत सिंह

हाल ही की घटनाएं! विशेष रूप से 23 दिसम्बर, 1929 को वायसराय की स्पेशल ट्रेन उड़ाने का जो प्रयत्न किया गया था, उसकी निन्दा करते हुए कांग्रेस द्वारा पारित किया गया प्रस्ताव तथा “यंग इंडिया” में गांधी जी द्वारा लिखे गए लेखों से स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने गांधी जी से साठ-गांठ कर भारतीय क्रांतिकारियों के विरुद्ध घोर आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया है। जनता के बीच भाषणों तथा पत्रों के माध्यम से क्रांतिकारियों के विरुद्ध बराबर प्रचार किया जाता रहा है। या तो यह जानबूझकर किया गया या फिर केवल अज्ञान के कारण उनके विषय में गलत प्रचार होता रहा और उन्हें गलत समझा जाता रहा; परन्तु क्रांतिकारी अपने सिद्धान्तों तथा कार्यों की ऐसी आलोचना से नहीं घबराते हैं। बल्कि वे ऐसी आलोचना का स्वागत करते हैं, क्योंकि वे इस बात का स्वर्णावसर मानते हैं कि ऐसा करने से उन्हें उन लोगों को क्रांतिकारियों के मूलभूत सिद्धान्तों तथा उच्चादर्शों को, जो उनकी प्रेरणा तथा शक्ति के अनवरत स्रोत हैं, समझने का अवसर मिलता है। आशा की जाती है कि इस लेख द्वारा आम जनता को यह जानने का अवसर मिलेगा कि क्रांतिकारी क्या हैं, और उनके विरुद्ध किए गए भ्रमात्मक प्रचार से उत्पन्न होने वाली गलतफहमियों से उन्हें बचाया जा सकेगा।

पहले हम हिंसा और अहिंसा के प्रश्न पर ही विचार करें। हमारे विचार से इन शब्दों का प्रयोग ही गलत किया गया है, और ऐसा करना ही दोनों दलों के साथ अन्याय करना है, क्योंकि इन शब्दों से दोनों ही दलों के सिद्धान्तों का स्पष्ट बोध नहीं हो पाता। हिंसा का अर्थ है अन्याय के लिए किया गया बल प्रयोग, परन्तु क्रांतिकारियों का तो यह उद्देश्य नहीं है, दूसरी ओर अहिंसा का जो आम अर्थ समझा जाता है वह है आत्मिक शक्ति का सिद्धान्त। उसका उपयोग व्यक्तिगत तथा राष्ट्रीय अधिकारों को प्राप्त करने के लिए किया जाता है। अपने-आपको कष्ट देकर आशा की जाती है कि इस प्रकार अन्त में अपने विरोधी का ह्रदय परिवर्तन संभव हो सकेगा।

एक क्रांतिकारी जब कुछ बातों को अपना अधिकार मान लेता है तो वह उनकी मांग करता है, अपनी उस मांग के पक्ष में दलीलें देता है, समस्त आत्मिक शक्ति के द्वारा उन्हें प्राप्त करने की इच्छा करता है, उसकी प्राप्ति के लिए अत्यधिक कष्ट सहन करता है, इसके लिए वह बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए प्रस्तुत रहता है और उसके समर्थन में वह अपना समस्त शारीरिक बल प्रयोग भी करता है। इसके इन प्रयत्नों को आप चाहे जिस नाम से पुकारें, परन्तु आप इन्हंर हिंसा के नाम से सम्बोधित नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसा करना कोष में दिए इन शब्द के अर्थ के साथ अन्याय होगा। सत्याग्रह का अर्थ है सत्य के लिए आग्रह। उसकी स्वीकृति के लिए केवल आत्मिक शक्ति के प्रयोग का ही आग्रह क्यों? इसके साथ-साथ शारीरिक बल-प्रयोग भी क्यों न किया जाए? क्रांतिकारी स्वतंत्रता-प्राप्ति के लिए अपनी शारीरिक एवं नैतिक शक्ति दोनों के प्रयोग में विश्वास करता है, परन्तु नैतिक शक्ति का प्रयोग करने वाले शारीरिक बल-प्रयोग को निषिद्ध मानते हैं। इसलिए अब सवाल यह नहीं है कि आप हिंसा चाहते हैं या अहिंसा, बल्कि प्रश्न तो यह है कि आप अपने उद्देश्य प्राप्ति के लिए शारीरिक बल सहित नैतिक बल का प्रयोग करना चाहते हैं, या केवल आत्मिक शक्ति का?

क्रांतिकारियों का विश्वास है कि देश को क्रांति से ही स्वतंत्रता मिलेगी। वे जिस क्रांति के लिए प्रयत्नशील हैं और जिस क्रांति का रूप उनके सामने स्पष्ट है, उसका अर्थ केवल यह नहीं है कि विदेशी शासकों तथा उनके पिट्ठुओं से क्रांतिकारियों का केवल सशस्त्र संघर्ष हो, बल्कि यह सशस्त्र संघर्ष के साथ-साथ नवीन सामाजिक व्यवस्था के द्वार देश के लिए मुक्त हो जाएं। क्रांति पूंजीवाद, वर्गवाद तथा कुछ लोगों को ही विशेषाधिकार दिलाने वाली प्रणाली का अन्त कर देगी। यह राष्ट्र को अपने पैरों पर खड़ा करेगी, उससे नवीन राष्ट्र और नये समाज का जन्म होगा। क्रांति से सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि वह मजदूर तथा किसानों का राज्य कायम कर उन सब सामाजिक अवांछित तत्वों को समाप्त कर देगी जो देश की राजनैतिक शक्ति को हथियाए बैठे हैं।

आज की तरुण पीढ़ी को जो मानसिक गुलामी तथा धार्मिक रूढ़िवादी बन्धन जकड़े हैं और उससे छुटकारा पाने के लिए तरुण समाज की जो बेचैनी है, उसी में क्रांतिकारी प्रगतिशीलता के अंकुर देख रहा है। नवयुवक जैसे-जैसे यह मनोविज्ञान आत्मसात करता जायेगा वैसे-वैसे राष्ट्र की गुलामी का चित्र उसके सामने स्पष्ट होता जायेगा तथा उसकी देश को स्वतंत्र करने की इच्छा प्रबल होती जायेगी। और उसका यह क्रम तब तक चलता रहेगा जब तक कि युवक न्याय, क्रोध और क्षोभ से ओतप्रोत हो अन्याय करने वालों की हत्या न प्रारम्भ कर देगा। इस प्रकार देश में आतंकवाद का जन्म होता है। आतंकवाद सम्पूर्ण क्रांति नहीं और क्रांति भी आतंकवाद के बिना पूर्ण नहीं। यह तो क्रांति का एक आवश्यक और अवश्यम्भावी अंग है। इस सिद्धांत का समर्थन इतिहास की किसी भी क्रांति का विश्लेषण कर जाना जा सकता है। आतंकवाद आततायी के मन में भय पैदाकर पीड़ित जनता में प्रतिशोध की भावना जागृत कर उसे शक्ति प्रदान करता है। अस्थिर भावना वाले लोगों को इससे हिम्मत बंधती है तथा उनमें आत्मविश्वास पैदा होता है। इससे दुनिया के सामने क्रांति के उद्देश्य का वास्तविक रूप प्रकट हो जाता है। क्योंकि ये किसी राष्ट्र की स्वतंत्रता की उत्कट महत्वाकांक्षा का विश्वास दिलाने वाले प्रमाण हैं। जैसे दूसरे देशों में होता आया है, वैसे ही भारत में भी आतंकवाद क्रांति का रूप धारण कर लेगा और अन्त में क्रांति से ही देश को सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक स्वतंत्रता मिलेगी। तो यह है क्रांतिकारी के सिद्धान्त, जिनमें वह विश्वास करता है और जिन्हें देश के लिए प्राप्त करना चाहता है। इस तथ्य की प्राप्ति के लिए वह गुप्त तथा खुले-आम दोनों ही तरीकों से प्रयत्न कर रहा है। इस प्रकार एक शताब्दी से संसार में जनता तथा शासक वर्ग में जो संघर्ष चला आ रहा है, वही अनुभव उसके लक्ष्य पर पहुंचने का मार्गदर्शक है। क्रांतिकारी जिन तरीकों में विश्वास करता है वे कभी असफल नहीं हुए।

हम प्रत्येक देशभक्त से निवेदन करते हैं कि वे हमारे साथ गम्भीरतापूर्वक इस युद्ध में शामिल हो। कोई भी अहिंसा और ऐसे ही अजीबो-गरीब तरीकों से मनोवैज्ञानिक प्रयोग कर राष्ट्र की स्वतंत्रता के साथ खिलवाड़ न करे। स्वतंत्रता राष्ट्र का प्राण है। हमारी गुलामी हमारे लिए लज्जास्पद है, न जाने कब हममें यह बुद्धि और साहस होगा कि हम उससे मुक्ति प्राप्त कर स्वतंत्र हो सकें? हमारी प्राचीन सभ्यता और गौरव की विरासत का क्या लाभ, यदि हममें यह स्वाभिमान न रहे कि हम विदेशी गुलामी, विदेशी झण्डे और बादशाह के सामने सिर झुकाने से अपने आपको न रोक सकें।

क्या यह अपराध नहीं है कि ब्रिटेन ने भारत में अनैतिक शासन किया? हमें भिखारी बनाया तथा हमारा समस्त खून चूस लिया? एक जाति और मानवता के नाते हमारा घोर अपमान तथा शोषण किया गया है। क्या जनता अब भी चाहती है कि इस अपमान को भुलाकर हम ब्रिटिश शासकों को क्षमा कर दें? हम बदला लेंगे, जो जनता द्वारा शासकों से लिया गया न्यायोचित बदला होगा। कायरों को पीठ दिखाकर समझौता और शान्ति की आशा से चिपके रहने दीजिए। हम किसी से भी दया की भिक्षा नहीं मांगते हैं और हम भी किसी को क्षमा नहीं करेंगे। हमारा युद्ध विजय या मृत्यु के निर्णय तक चलता ही रहेगा। इन्कलाब जिन्दाबाद! (26 जनवरी, 1930)

करतार सिंह

अध्यक्ष

हिन्दुस्थान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन

(भगत सिंह का छद्म नाम)

(स्रोत : भगत सिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज, संपादक-चमन लाल)

बम की उपासना – गांधी

भारत के राजनैतिक विचार रखने वाले वातावरण में हम लोगों के चारों और इतनी ज्यादा हिंसा व्याप्त है कि कभी इधर तो कभी उधर बमों के फेंके जाने से किसी को कोई परेशानी महसूस नहीं होती; और शायद ऐसी किसी घटना के हो जाने पर कुछ लोगों के दिलों में खुशी तक होती है। यदि मैं यह न जानता होता कि यह हिंसा किसी हिलाये गये तरल पदार्थ में ऊपर के तल पर उठकर आया हुआ झाग ही है, तो शायद मैं निकट भविष्य में अहिंसा से स्वतंत्रता दिला सकने में सफल होने के बारे में निराश हो जाता। हिंसा या अहिंसा का सिद्धांत मानने वाले हम सब लोग ही स्वतंत्रता के लिए प्रयत्ननशील हैं। खुशकिस्मती से पिछले लगभग 12 महीनों में भारत के अपने दौरे के अनुभवों के आधार पर मुझे ऐसा कुछ विश्वास हो गया है कि देश की विशाल जनता जो इस तत्व से वाकिफ है कि हमें स्वतंत्रता प्राप्त करनी ही है, हिंसा की भावना से अछूती है। इसलिए वाइसराय की रेलगाड़ी नीचे हुए बम विस्फोटों की तरह होने वाले इक्के-दुक्के हिंसापूर्ण विस्फोटों के बावजूद मैं यह मानता हूं कि हमारे राजनीतिक संघर्ष में अहिंसा की जड़ें जम गई हैं। राजनीतिक संघर्ष में अहिंसा की प्रभावशीलता में मेरे बढ़ते हुए विश्वास और जनता के इस पर चल सकने की सम्भावना के कारण ही, मैं उन लोगों को जो अभी हिंसा के विचारों से इतने ओतप्रोत नहीं हुए हैं कि उन पर तर्कों का कोई असर न हो, अपनी बात समझाना चाहता हूं।

तो फिर हम एक क्षण यह सोचें कि यदि वाइसराय गम्भीर रूप से घायल हो जाते या मारे जाते तो क्या होता। तब यह तो निश्चित ही है कि पिछले महीने की 23 तारीख को कोई सभा नहीं हो पाती और इसलिए यह निश्चित न हो पाता कि कांग्रेस को क्या तरीका अपनाना है। कम-से-कम कहा जाये तो भी यह एक अवांछनीय परिणाम तो होता ही। हम लोगों के सौभाग्य से वाइसराय और उनके दल में कोई जख्मी नहीं हुआ और उन्होंने बड़े सहज भाव से दिनभर का अपना कार्यक्रम इस तरह निभाया, मानो कुछ हुआ ही न हो। मैं जानता हूं कि जिन लोगों को कांग्रेस का भी कोई खयाल नहीं है, जो उससे कुछ आशा नहीं रखते और जिन्हें सिर्फ हिंसा के साधन का ही भरोसा है, उन पर इस परिकल्पी तर्क का कुछ असर नहीं पड़ेगा। लेकिन मैं आशा करता हूं कि अन्य लोग इस दलील के सार को समझ सकेंगे और मैंने जिस परिस्थिति की कल्पना करके बात सामने रखी है उससे जो महत्ववपूर्ण निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं उन्हें एक साथ मिला कर देख सकते हैं।

फिर, इस देश में अभी तक राजनीतिक हिंसा से जो कुछ हाथ लगा है, उसे लीजिए। जब-जब हिंसा हुई है, हर बार हमें गहरा नुकसान पहुंचा है; अर्थात् सैनिक खर्च बढ़ा है। अगर कोई इसके उत्तर में मार्ले-मिन्टो सुधार, मांटेग्यु सुधार जैसी चीजों की ओर इशारा करे तो मैं उन्हें मानने को तैयार हूं। लेकिन अब दिनों-दिन राजनीतिज्ञों में यह बात महसूस करने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है कि जबर्दस्त आर्थिक बोझ के बदले हमें खिलौनों जैसे ये सुधार दिये गये हैं। नगण्य रियायतें तो दी गई हैं, कुछ और भारतीयों को सरकारी नौकरियां मिल गई हैं, किंतु उस जनता का बोझ, जिसके नाम पर और जिसके लिए हम स्वतंत्रता चाहते हैं, और भी बढ़ गया है और बदले में उसे कुछ भी नहीं मिला है। यदि हम इतना ही समझ लें कि सिर्फ विदेशियों को डरा कर ही हमें स्वतंत्रता प्राप्त नहीं होगी, बल्कि खुद भय त्याग कर और ग्रामीण मित्रों को अपना भय त्यागना सिखला कर हम सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त करेंगे, तो यह बात तुरत हमारी समझ में आ जायेगी कि हिंसा आत्मघातक है।

फिर आप इसकी खुद हम लोगों पर होने वाली प्रतिक्रिया की बात सोचिए। विदेशी शासकों को मारने के बाद अपने ऐसे देशवासियों को मारना एक स्वाभाविक कदम ही होगा, जिन्हें हम देश की प्रगति में बाधा डालने वाला मानेंगे। अन्य देशों में हिंसात्मक कार्यवाहियों का चाहे जो परिणाम हुआ हो और अहिंसा के दर्शन का हवाला दिये बिना भी यह समझने में कुछ बौद्धिक प्रयत्न की जरूरत नहीं है कि यदि हम प्रगति में बाधा डालने वाले उन अनेक दोषों से समाज को मुक्त कराने के लिए हिंसा का सहारा लेते हैं तो हम केवल अपनी कठिनाइयां ही बढ़ायेंगे और इससे स्वतंत्रता का दिन और भी दूर हटेगा। जो लोग सुधारों की आवश्यकता नहीं समझते क्योंकि वे उनके लिए तैयार नहीं है, सुधारों के जबर्दस्ती लाये जाने पर वे क्रोध से पागल हो उठेंगे और बदला लेने के लिए विदेशों की मदद मागेंगे। या पिछले कई वर्षों में हमारी आंखों के सामने यही नहीं होता रहा है; अब भी इसकी दुखद याद हमारे सामने स्पष्ट है।

अब तर्क का भावात्मक पहलू ले लीजिए। जब 1920 में अहिंसा कांग्रेस के सिद्धांत का अंग बन गई और कांग्रेस मानो जादू से एक सर्वथा परिवर्तित संस्था बन गई। कोई नहीं जानता कि जनता में जागृति कैसे आ गई। यहां तक कि दूरस्थ गांवों में भी हलचल मच गई। ऐसा लगाता था कि बहुतेरी बुराइयां बिल्कुल निकल गई हैं और लोग अपनी शक्ति पहचानने लगे हैं। उन्होंने सत्ताधारियों को मदद देना बंद कर दिया। अलमोड़ा में तथा भारत के अन्य कई भागों में जहां कहीं जनता को अपने भीतर निहित शक्ति का भान हुआ, बेगार की प्रथा कुहरे की तरह छट गई। यह स्वयं अपनी शक्ति से स्वतंत्रता प्राप्त करना था। यह आम जनता द्वारा आम जनता के लिए प्राप्त सच्चा स्वराज्य था। यदि चौरी-चौरा कांड में परिणत होने वाली घटनाओं से अहिंसा की प्रगति में बाधा न पड़ी होती, तो मैं बिना संकोच के यह कह सकता हूं कि हम लोग अब तक पूर्ण स्वराज्य पा चुके होते। इस बात पर किसी ने मतभेद प्रकट नहीं किया है। लेकिन कई लोगों ने मतभेद प्रकट करते हुए यह तो अवश्य कहा है, “लेकिन आप आम जनता को अहिंसा नहीं सिखला सकते। यह तो व्यक्तियों को ही सिखलाई जा सकती है और ऐसे व्यक्ति भी विरले ही होंगे।” मेरी समझ में ऐसा सोचना अपने आपको जबर्दस्त धोखा देना है। यदि मानव स्वभाव से अहिंसक न होता तो वह अपने आपको युगों पूर्व नष्ट कर चुका होता। लेकिन हिंसा और अहिंसा की शक्तियों में होने वाले द्वंद्व में अंत में अहिंसा सदैव विजयी रही है। सच तो यह है कि हममें प्रतीक्षा करने और लोगों में यह प्रचार करने के लिए अपने आपको पूरे मन से लगा देने का धैर्य नहीं है कि वे राजनीतिक उद्देश्यों के लिए अहिंसा को साधन रूप में अपनायें।

अब हम लोग एक नये युग में प्रवेश कर रहे हैं। पूर्ण स्वराज्य हमारा गंतव्य दूरस्थ नहीं वरन तात्कालिक उद्देश्य है। क्या यह स्पष्ट नहीं है कि यदि हमें करोड़ों लोगों में स्वराज्य की सच्ची भावना उपजानी है, तो वैसा हम सिर्फ अहिंसा द्वारा और उसके अंतर्गत आने वाली सभी चीजों द्वारा ही कर सकेंगे। इतना ही काफी नहीं है कि हम गुप्त हिंसा द्वारा अंग्रेजों का जीवन खतरे में डालकर उन्हें बाहर भगा दें। इससे स्वराज्य नहीं मिलेगा; एकदम अराजकता फैल जायेगी। हम अपनी बात लोगों के दिल और दिमाग को जांचकर, अपने बीच परस्पर एकता पैदा करके और अपने मतभेद समाप्त करके स्वराज्य स्थापित कर सकते हैं; और जिन्हें हम अपनी प्रगति में बाधा डालने वाला मानते हैं उन लोगों को डराकर या मारकर नहीं बल्कि उनसे धैर्य और नरमी से व्यवहार करके, विरोधी का हृदय-परिवर्तन करके हम सामूहिक सविनय अवज्ञा करना चाहते हैं। यह बात तो सभी स्वीकार करते हैं कि यह उपाय एक निश्चित उपाय है। सभी समझते हैं कि सविनय का अर्थ यहां पूर्ण अहिंसा है; और क्या यह कई बार स्पष्ट नहीं हो चुका है कि सामूहिक अहिंसा और सामूहिक अनुशासन के बिना सविनय अवज्ञा असम्भव है? और कुछ नहीं तो जिसकी ओर मैंने संकेत किया है ऐसी सीमित ढंग की अहिंसा हमारी स्थिति की मांग है; इस बात का विश्वास दिलाने के लिए हमारी धार्मिक भावना को उभारने की निश्चय ही आवश्यकता नहीं है। इसलिए जो लोग विवेकशील हैं उन्हें इस हाल के बम-विस्फोट जैसे कार्यों का छुपे या खुले ढंग से अनुमोदन करना बंद कर देना चाहिए। बल्कि उन्हें खुले आम और पूरे हृदय से इन विस्फोटों की निंदा करनी चाहिए, ताकि हमारे बहके हुए देशभक्त अपनी हिंसात्मक भावनाओं को मिलने वाले प्रोत्साहन के अभाव में हिंसा की व्यर्थता और हिंसात्मक कार्यवाहियों ने हर बार जो बड़ा भारी नुकसान किया है, उसे समझ जायें।