शिवाजी समाज बनाने, पटेलों और मराठाओं से रिश्ता और समकक्षता गढ़ने जैसी परिघटनाओं का हवालादेकर आदिवासी होने की मांग को अमान्य करना युक्तिसंगत नहीं. बहुत सारे समुदाय ऐसे सामाजिक अवरोहों, आरोहों, संक्रमणों से गुजरते हैं. शायद ही कोई जनजाति पहले जैसी आदिवासी विशिष्टताओं और स्वायत्तताओं से लैश रह गई है. कई जनजाति पर तो हिंदू और ईसाई संस्कृति का गहरा असर हो गया है. अपना पुरोहित, अपनी भाषा भी वे खो बैठे हैं. तब तो उन्हें भी सूची से बाहर कर देना चाहिये? संथाल समाज भाषा के स्तर पर अन्य आदिवासी समाजों के विपरीत सशक्त और उन्नत हो रहा है. आदिवासी समाज में पहले स्वतंत्र धार्मिकता की परंपरा तो थी, पर वह सचेत और मुखर नहीं थी. पहले सरना कोड बनाने की लहर कहां थी. आज प्रखर है. इसी तरह कुड़मी समाज में भी अच्छे खासे हिस्से में आदिवासीपन की ललक जगी है. हिंदूकरण की दौर में अपने ही समाज के एक हिस्से की अनिच्छा या प्रतिरोध के बावजूद आदिवासी बनने की चाह में कुछ पुराने विरासत हैं, कुछ सकारात्मक है, इस रूप में लेने की जगह सिर्फ नकारात्मक लेने, षडयंत्र मानने की मानसिकता सही नहीं है.

राजनीतिक स्वार्थ या नीयत के आधार पर सामाजिक सांस्कृतिक तथ्यों और उनमें संभावित सकारात्मकताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. राजनैतिक नीयत, सामाजिक सांस्कृतिक तथ्यों को बना या मिटा नहीं सकती. क्या संथाल और मुंडा जैसी बड़ी और दबंग जनजातियां अनुसूचित जनजाति की सूची के ही असुर, पहाड़िया एवं अन्य आदिम जनजाति को समान हैसियत और हिस्सेदारी देने की नीयत रखते हैं? इनमें राजनैतिक वर्चस्व बनाने की नीयत नहीं है. क्या इस नीयत के कारण उन्हें नियंत्रित या वहिष्किृत कर देना चाहिये? ऐसा नहीं कहा जा सकता कि सरना आदिवासियों का ईसाई और हिंदू धर्म में हो रहा धर्मांतरण सकारात्मक अनुकरणीय सांस्कृतिक परिधटना है. ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि ईसाईयों द्वारा सुनियोजित और समझाया बुझाया धर्मांतरण नहीं होता. हर धर्मांतरण आत्म प्रेरित या स्वैच्छिक है. ईसाई संस्थानों को क्लीन चिट नहीं दिया जा सकता. कार्यकर्ताओं की तरह आम आदिवासी उन्हें क्लिन चिट देते भी नहीं. फिर भी संघ-भाजपा जैसी हमलावर और खतरनाक शक्तियों के खिलाफ तमाम तरह के आदिवासियों की एकजुटता बनाये रखने की पूरी कोशिश होती है. उसी तरह कर्मियों की आदिवासी बनने की मांग पूरी तरह निश्छल नहीं. फिर भी गैर आदिवासीपन, आदिवासी विरोध, हिंदू आक्रमकता, झारखंडियों की बर्बादी के इस बढ़े दौर में झारखंडी एकता के मद्देनजर भाजपा की कूटनीति के जवाब में भी इस मांग पर तथ्यपूर्ण ढंग से सोचने की तैयारी व्यक्त करने की जरूरत है. आरोप प्रत्यारोप छोड़ कर सामुदायिक प्रतिस्पर्धा से मुक्त हो कर सामाजिक सांस्कृतिक लक्षणों के आधार पर यह तय करें कि कुर्मी आदिवासी घोषित करने लायक हैं या नहीं. आदिवासियत की कुछ बुनियादी कसौटियों के आधार पर ही यह तय हो सकता है. सरकार की मनमानी या चालाक पसंद-नापसंद और पहले से सूचीदर्ज आदिवासियों की भावनाप्रधान सहमति-असहमति को निर्णायकता नहीं दी जा सकती.

आदिवासी समाज के बारे में अध्ययन, आदिवासी समाजों से दशकों से प्रत्यक्ष संबंध के आधार पर मैंने आदिवासियों की सामाजिक सांस्कृतिक विशिष्टता के आधार पर कुछ बुनियादी कसौटियों की समझ बनाई है. 1. उनकी स्वतंत्र सामाजिक व्यवस्था होती है. किसी अन्य सामाजिक समुदाय के साथ अनिवार्य स्तरीकृत सामाजिक संबंध में वे बंधे नहीं होते. 2. उनकी स्वतंत्र धार्मिकता होती है. नितांत अपने सामुदायिक धर्म स्थल और पुरोहित होते हैं जो अन्य धर्मांे से स्पष्टतः भिन्न होता है. 3. उनकी अपनी स्वतंत्र सामुदायिक भाषा होती है. 4. बहुजातीय हिंदू धर्म के गोत्र/किल्लियों से इनके गोत्र नाम, किल्ली नाम और उससे जुड़ी मान्यतायें पूरी तरह अलग होती हैं.

स्वतंत्र सामाजिकता, स्वतंत्र सामुदायिक भाषा ‘कुड़माली’, स्वतंत्र पुजारी और हिंदू धर्म से भिन्न गोत्र ‘किल्ली’ का अस्तित्व कहीं कम कहीं ज्यादा सारे कुड़मियों में देखने को मिल जाता है. स्वतंत्र भाषा और स्वतंत्र पुजारी का अस्तित्व अधिकांश जगहों पर क्षरणशील होने के बावजूद हैं. इन्हें फिर से जीवित बनाने फैलाने की कोशिशें चलने लगी हैं. स्वतंत्र सामाजिकता, प्रशासनिक स्तर ओबीसी दर्जे के कारण अवश्य खंडित हुई दिखती है. पर यह तो आदिवासी दर्जे से बाहर होने का परिणाम था. स्वतंत्र धार्मिकता, स्वतंत्र भाषा के पूरी तरह स्थापित होने पर यह स्वतंत्र सामाजिकता भी स्पष्टतर रूप ले लेगी. आदिवासी की स्वतंत्र सामाजिक पहचान का आंदोलन इस स्वतंत्र सामाजिकता को निर्णायक रूप से स्थापित कर देगी. इसकी कोशिशें कुड़मी समाज के अंदर चल रही हैं. अन्य आदिवासी समाजों का समर्थन इन्हें हिंदू समाज की पिछड़ी जाति के भ्रामक/नकली पहचान से पूरी तरह मुक्त करने में मदद देगा.

आदिवासियों का संदेह या अविश्वास घट सके, कुर्मियों के निहित या कथित स्वार्थ पर नियंत्रण हो सके, इसके लिए कुछ शर्तों पर, कुछ प्रावधानों के साथ आदिवासी सूची में दर्ज होने की मांग को समर्थन किया जा सकता है, किया जाना चाहिये. पेसा के एकल पद पर कुर्मी जैसे नवागत या खंडित निरंतरता के आदिवासियों को हिस्सेदारी नहीं मिलेगी. इसी तरह अनुसूचित जनजाति के विधानसभाई और संसदीय आरक्षित चुनाव क्षेत्रों में उन्हें उम्मीदवारी नहीं मिलेगी. कुर्मियों के आदिवासी श्रेणी में शामिल होने के बाद आदिवासी संख्या में जितनी वृद्धि होगी उतनी आदिवासी आरक्षण में वृद्धि होगी. पिछड़ी जाति की संख्या में जितनी कमी होगी, पिछड़ी जाति के आरक्षण में उतनी कटौती होगी. आदिवासी और कुर्मी दोनों जितनी स्पष्ट सहमति बनायेंगे, उतना अच्छा.

आदिवासियों की तीन श्रेणियां बनाकर और उनके लिए अलग-अलग प्रावधान बना कर भी कई समस्याओं को सुलझाया जा सकता है. पहली श्रेणी आदिम जनजातियों की हो. उन्हें आबादी के अनुपात से ज्यादा आरक्षित अवसर और भागिदारी दी जाये. दूसरी श्रेणी सामान्य जनजातियों की हो. इन्हें आबादी के अनुपात में आरक्षण दिया जाये. तीसरी श्रेणी नवागत या क्रम खंडित आदिवासियों की हो, इन्हें आबादी के अनुपात से कम आरक्षण मिले.

मेरी समझ यह है कि पलामू, हजारीबाग, गया, आदि जगहों पर अच्छी खासी आबादी रखने वाली भूईयां जैसी दलित जाति वस्तुतः जनजाति रही है, कमोबेस अब भी है. भुईयां हिंदू प्रभाव के मामले में रविदास, दुसाध आदि से ज्यादा मुक्त हैं. वे हिंदू जाति के पंचम वर्ण अति शूद्र श्रेणी में बने रहें और जनमुक्ति के भीषण संघर्ष में लगे रहें या नव बौद्ध बन जाये, इससे अच्छा होगा कि वे आदिवासियत का दावा करें, अपनी स्वतंत्र धार्मिकता और सामाजिकता की संघात्मकता, विस्तारशील, सृजनशील सांस्कृतिक धारा विकसित करें.

आदिवासियत को आत्मसात करने के लिए ईमानदार और तत्पर कुर्मी हिंदुत्व और ब्राह्मण प्रभाव से जितना मुक्त होंगे, अपनी स्वतंत्र भाषा को जितना पुनस्र्थापित कर पायेंगे, अपनी स्वतंत्र धार्मिकता जितनी प्रखर बनायेंगे, उनके इस अभियान की विश्वसनीयता और सार्थकता उतनी बढ़ेगी. उन्हें यह भी सिद्ध करना होगा कि वे पुराने आदिवासियों के पारंपरिक हिस्सेदारी में घुसपैठ, लूटपाट नहीं करना चाहते. सामाजिक, सांस्कृतिक आकांक्षा के लिए राजनैतिक महत्वाकांक्षा और स्वार्थ का कुछ त्याग अवश्य करना होगा.

आदिवासियों को भी आदिवासियत के प्रसार के सकारात्मक लक्ष्य के लिए कुछ जटिलताओं और चुनौतियों से निबटने के लिये सावधान और तैयार रहना होगा. झारखंड में ऐसे ही मुहिमों के जरिये आदिवासी संख्या का बिस्तार कर आदिवासी संस्कृति और राजनीति को सशक्त कर छठी अनुसूची या उसके सदृश्य दर्जा हासिल करने की ओर भी शायद बढ़ा जा सके.