पिछले महीने मैं बाँका जिले के बांका, चाँदन कटोरिया बेलहर प्रखंडों के फॉरेस्ट गांव में एक सप्ताह की पदयात्रा में रहा. यह इलाका पटना से 300 किमी दूर है. मैं 2014 से यहां आता रहा हूं. परंतु यहां लगातार रुक कर यदि लोगों के संदेहों का समाधान नहीं किया जाता है तो पीढ़ियों से वनाधिकार की जो स्थिति रही है, उसे गंवाने का दौर आ जाएगा. वनाधिकार की मान्यता का कानून एफआरए की वजह से जहाँ लोगो के जीवन और रोजगार को मान्यता मिलनी है, उससे उल्टी स्थिति बन जायेगी.

ध्यान देने वाली बात यह है की बांका जिले में ही कटोरिया विधान सभा क्षेत्र, बिहार विधानसभा में प्रतिनिधित्व के लिए आदिवासी आरक्षित क्षेत्र है. बांका, भागलपुर, जमुई, मुंगेर, कटिहार, पूर्णिया इलाके में सघन रूप से संथाल समुदाय के लोग रहते हैं. पड़ोसी राज्य झारखंड के दुमका से कई जगह इन जिलों की (बांका की भी) सीमा मिलती है, परंतु दुमका जिले में भी, यानि झारखंड में भी फॉरेस्ट राइट के बारे में मान्यता देने वाले अधिकारियों के बीच में विरोध भावना या असमंजस है. बिहार के जिलों में भी यही स्थिति है.

700 आदिवासी परिवारों ने बांका जिले में वनाधिकार की दावेदारी के लिए पक्के प्रमाण के साथ आवेदन दिया था. उसका कोई मोल नही रहा. सबको पटना हाईकोर्ट ने बेतुके ढंग से खारिज कर दिया. हम लोगों ने बिहार के लिए पटना हाई कोर्ट मंे इस विषय पर जो पीआईएल दाखिल किया था, उस पर पटना हाई कोर्ट के बेंच ने 6 साल के बाद अनुकूल फैसला दिया. उस वजह से जिन परिवारों का दावा खारिज कर दिया गया था, उन लोगों को अपील करने का मौका दिया गया. गया जिले में 652 वन निवासियों ने अपील किया. उस अपील पर अभी तक हाईकोर्ट के निर्देश के बावजूद सुनवाई नहीं हुई.

बांका जिले में अपील करने के लिए भी लोगों में जागरूकता नहीं आई. लोग समय रहते अपील नही कर पाए. इस वजह से इस विषय पर आम उभार लाने की यह कोशिश है. इसके बारे में संशय इसलिए है, क्योंकि दलाल तबकों ने यह भ्रम फैला दिया है कि सरकार , आम दावेदार लोगों को वनों में अधिकार देने के लिए तैयार नहीं होगी.

उड़ीसा में साढ़े तीन लाख दावेदार परिवारों को लगभग 500000 एकड़ जमीन पर उनके अधिकारों को मान्यता दे दी गई है. बिहार अभी एफआरएं के मामले मैं पिछड़ रहा राज है. यह बिहार के अधिकार आंदोलनों के लिए चुनौती के समान है. हम लोग 4 जनवरी 2008 से एफआरए के लिए विधिवत लगे हुए हैं और वन भूमि के दावेदार परिवार के लोग भी यह मानते हैं कि वन भूमि पर उनका अधिकार पक्का है, परंतु सभी जगह वन विभाग का इस कानून के प्रति अस्वीकार की भावना ही है.

बिहार के जंगलों की स्थिति ऐसी है, कि कोई यह कह सकता है कि यहां वन विभाग को बंद कर देना चाहिए या समेट देना चाहिए. आमतौर पर बिहार में जंगल डिफॉरेस्टेशन के शिकार हैं, यानि पिछले या छिछले वन मे बदल गए हैं. वनीकरण के लिए, वन विभाग उसी जमीन पर पेड़ लगाने की कोशिश करता है, जिस जमीन पर लोग खेती कर रहे हैं या बसे हैं. जिस जमीन पर उन्हें परंपरागत अधिकार है, इसका मालिकाना हक देने लिए कानून भी बनकर तैयार है, लेकिन वन विभाग ‘लार्जेस्ट लैंडलॉर्ड’ की भूमिका में रहने की ही कोशिश मंे लगा रहता है. बीस लाख एकड़ जमीन के स्वामी की तरह आचरण कर रहा है.

यही स्थिति कमोबेस झारखंड की भी है.