नजरिया कालम में मैं सामान्यतः आदिवासी विषयों पर ही लिखता हूं. लेकिन दिल्ली में दो तीन दिन बाद चुनाव के लिए मतदान होने हैं, तो मेरी स्पष्ट समझ है कि यदि मोदी और केजरीवाल के बीच चुनाव होना है तो मैं केजरीवाल को चुनूंगा. मेरे तमाम सहमना साथी भी. क्योंकि केजरीवाल में भले कई खामियां हों, लेकिन मोदी के मुकाबले वे बेहतर हैं. पढ़े लिखे हैं, अपनी पत्नी से स्नेह करते हैं, बिना अपराध के किसी को जेल में डाल कर मार डालने की साजिश नहीं रचते, लोकतंत्र में उनकी आस्था है, आम लोगों के बीच सहजता से उठते बैठते हैं.
रहा भ्रष्टाचार का आरोप, तो भ्रष्टाचार की परिभाषा क्या है, पहले उसके बारे में स्पष्ट समझ बनाईये. ठीक दो राज्यों में चुनाव के पहले मतदाता को रिझाने के लिए आय कर में भारी छूट देना भ्रष्टाचार नहीं? मूढ़ता के सागर में डुबकी लगाने का निमंत्रण देना भ्रष्टाचार नहीं? इसे हम कानून सम्मत भ्रष्टाचार ही कहेंगे. हालांकि भ्रष्टाचार की संकुचित परिभाषा वह है जो भारतीय दंड संहिता के दायरे में आता है जिसके तहत कोई क्लर्क किसी काम के लिए किसी से हजार, पांच सौ की रिश्वत लेता पकड़ा जाता है तो वहीं भ्रष्टाचार है. बैकों से करोड़ों रुपये लेकर डकार जाना और सत्ता प्रतिष्ठानों द्वारा ‘बैड एसेट’ कह कर उसे खाता से मिटा देना भ्रष्टाचार नहीं.
इस संकुचित नजरिये वाले भ्रष्टाचार के कई आरोप केजरीवाल पर लगे. केजरीवाल क्या, विपक्ष के तमाम नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और उनमें से अधिकतर भाजपा में शामिल हो कर धुल गये. इसलिए भ्रष्टाचार की बात नहीं ही करें. भ्रष्टाचार हमारी व्यवस्था में बद्धमूल है. केजरीवाल पर शराब घोटाले में आरोप लगे, उन्हें महीनों जेल में बंद रखा गया और कोर्ट में आरोप प्रमाणित नहीं हो सका, इसलिए वे जमानत पर हैं. इसलिए मेरी नजर में केजरीवाल का भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं. इससे इतर वे औसत से बेहतर मुख्यमंत्री रहे हैं. गरीब जनता के बच्चों के लिए बेहतर सरकारी स्कूल, चिकित्सा व्यवस्था, बिजली माफी, पानी बिल में आधा माफी आदि उन्होंने दिल्ली की जनता को दिया है.
रही उनके जीत की संभावना की बात? कांग्रेस की उपस्थिति की वजह से आशंका जतायी जा रही है कि वोट बंटेंगा और भाजपा को लाभ होगा. लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता. मेरा शुरु से मानना है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों मध्यममार्गी पार्टी है और उनका वोट बैंक भी एक ही है. यानी दोनों सवर्णों की पार्टी, बस वंचितों के वोटों को जोड़ कर उनकी जीत- हार तय होती है. अब चूंकि सवर्ण जातियां पूरी तरह भाजपा के पीछे गोलबंद है तो रहे दलित, अल्पसंख्यक और महिला वोटर. अल्पसंख्यक अभी सिर्फ भाजपा को हराने के लिए वोट करते हैं. कांग्रेस के जीत के आसार नहीं, इसलिए वोट केजरीवाल को ही जायेगा. महिलाओं के लिए केजरीवाल ने बहुत कुछ किया है. मुफ्त में बस में सफर, महिला सम्मान योजना, बिजली बिल में माफी और पानी के बिल में कटौती. गरीब तबके को चिकित्सा की थोड़ी बहुत सुविधा, अच्छे सरकारी स्कूल.
इसलिए मेरे हिसाब से केजरीवाल की पार्टी जीत रही है. हालांकि, दिल्ली एक अधूरा राज्य है. केजरीवाल जीत कर भी गर्वनर के अधीन ही काम करने को बाध्य रहेंगे. प्रशासन पर उनका नियंत्रण नहीं रहेगा. फिर भी देश की राजधानी दिल्ली में पूर्व की तरह मोदी की हार जरूरी है. आप केहेंगे कि अभी की वजट से मिडिल क्लास मोदी के पीछे गोलबंद होगा, लेकिन वह तो पहले भी था. इससे कोई बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला.