सरहुल त्योहार आदिवासियों की एक प्रमुख त्योहार है आदिवासी समुदाय हर्षोल्लास से मनाता है लेकिन आदिवासियों के विभिन्न समुदायों का सरहुल मनाने का समय और तरीका अलग-अलग होता है. झारखंड में आदिवासियों में उरांव समाज, हो समाज, संताल समाज, मुंडारी समाज, खड़िया समाज मुख्य रूप से आता है. इन सबके द्वारा इस त्योहार को अलग-अलग समय और तरीके से मनाए जानें का विधान है.

वसंत ऋतु में जब पेड़ पतझड़ में अपनी पुरानी पत्तियों को गिरा कर टहनियों पर नयी पत्तियां लाने लगती है, तब सरहुल का पर्व मनाया जाता है. यह पर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के तृतीया से शुरू होता है और चैत्र पूर्णिमा को समाप्त हो जाता है. इस बार 24 मार्च 2023 दिन शुक्रवार को सरहुल पर्व मनाया जायेगा. उसके लिए आदिवासी समाज के लोग अभी से आने वाले नये फूल, फल, पत्ते को अपने ह्रदय से उसकी अगवानी करते है.ं सरहुल पर्व को झारखंड की विभिन्न जनजातियां अलग-अलग नाम से मनाती हैं. उरांव जनजाति इसे खुदी पर्व, संथाल बाहा पर्व, मुंडा बा पर्व और खड़िया जनजाति जंकौर पर्व के नाम से मनाते हैं.

सरहुल पर्व मनाने का तात्पर्य यही है, कि जितने भी नये फल, फूल पत्ते आते हैं, उसका स्वागत करना और आदिवासी समाज इसी त्याहार से नए साल की शुरूआत करता हैं. अच्छे से पूरे वर्ष पेड़ों में फल फूल हो, उसकीे कामना करता है और इसके लिए सरहुल पूजा करता हैं. आदिवासी समाज बहुत ही गहराई से प्रकृति के प्रति प्रेम रखता है. फगुआ काटने के बाद से ही हमारे बुजुर्ग सरहुल का उपवास रखना शुरू कर देते हंै. जितने भी नए फल आते हंै, बुजुर्गों का कहना है कि उसका एक नया जीवन होता है और हम उसका प्रेम और हर्षोउल्लास से स्वगत करेंगे. उस नए फूल, फल, जैसे-कटहल, पुटकल, सहजन, डुम्बर, लाल गंधार साग, साल का पेड़, फूल, केकड़ा, मछ्ली को जब तक धर्मेश, धरती, सूर्य ओर हमारे पूर्वजों को, जो अभी हमारे साथ नही हैं, उनमें से सबका नाम लेकर उसको भोग नहीं चढ़ा लेते, तब तक हम भी उसे ग्रहण नहीं करते हैं. इस पर्व के बाद ही हम उसे ग्रहण करने के अधिकारी बनते हैं.

इसे हम फसलों का त्योहार भी कह सकते हैं. पूजा के दौरान लोग रंगुआ मुर्गा, कसरी मुर्गी, माला मुर्गा की बलि भी देते हैं. इसके लिए अभी से सभी ढूंढना शुरू कर देते हैं. आदिवासियों की परंपरा के अनुसार इस पर्व के बाद ही नई फसल (रबि) विशेषकर गेहूं की कटाई आरंभ की जाती है.

एक तो यह त्योहार हमे यह याद दिलाता है कि धरती और सूर्य के सम्बंध से ही प्रकृति में हरियाली आती हैं. सुबह सरहुल के दिन सभी सरना स्थान में एकजुट होकर पूजा अर्चना करते हैं. पाहन और बाकी सभी उपवास रख पूजा करते है. उसके बाद सभी शाम में जुलूस में शामिल होते हैं.

सरहुल त्योहार की शुरुआत हो चुकी है. आप सभी आदिवासियों को आने वाला सरहुल पर्व की बहुत बहुत शुभकामनाएं.