बेशक राहुल गांधी सहित विपक्ष का यह कहना सही नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सीजीआई की समिति करे. सुप्रीम कोर्ट ने इतना कहा था कि इसके लिए नया कानून बनने तक यह व्यवस्था रहे. सरकार ने कानून बना दिया. उस कानून के तहत तीन लोगों की जो चयन समिति बनी उसमें विपक्ष के नेता को भी शामिल कर लिया, बस सीजेआई की जगह प्रधानमंत्री के अलावा सत्ता पक्ष का एक और सदस्य रख लिया.
बेशक इसमें सुप्रीम कोर्ट के आदेश का कोई उल्लंघन नहीं हुआ. मगर इसी तर्क से इमरजेंसी लगाने के फैसले सहित इमरजेंसी के दौरान हुए सारे संविधान संशोधन ‘वैध’ थे. मगर क्या वे ‘उचित’ भी थे! यह सरकार क्या मानती है?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बने कानून का व्यवहार में अर्थ यह हुआ कि समिति में सरकार के दो, विपक्ष का एक सदस्य. मतलब सरकार जिसे चाहे उसे नियुक्त कर सकती है. संविधान के मूल प्रावधानों के अनुसार चुनाव आयुक्त की नियुक्ति कार्यपालिका के ही अधिकार क्षेत्र में है. पहले ऐसा होता भी था. मगर चुनाव अयोगों की निष्पक्षता पर लगातार बढ़ते संदेहों के कारण यह विचार सामने आया कि एक चयन समिति हो, जिसमें सिर्फ सरकार के लोग नहीं हों. सुप्रीम कोर्ट के उसे आदेश के पीछे भी भाव यही था. मगर सरकार ने उस आदेश का ‘संविधानतः’ पालन करते हुए उस मंशा पर पानी फेर दिया. इसलिए इस कथन या तर्क में कि फैसला संसद में बने कानून के तहत हुआ है और ‘वैध’ है, इसलिए इस पर कोई सवाल नहीं उठना चाहिए, एक धूर्तता निहित है, जिसे ‘भक्तों’ के अलावा शायद ही कोई उचित मानेगा. जरूरी नहीं कि हर ‘वैध’ फैसला सही भी हो!