वरिष्ठ कवि श्री चंद्रकांत देवताले का निधन हिन्दी के लेखक-पाठक समाज को शोक-संतप्त कर देनेवाली ख़बर है. वे एक महीने से अधिक समय से दिल्ली के पटपड़गंज स्थित एक अस्पताल में भर्ती थे, जहां कल रात उनका देहावसान हुआ. आज दिल्ली के लोधी रोड के विद्युत शवदाहगृह में दिन के 2:30 बजे उनका अंतिम संस्कार किया गया.

81 वर्षीय देवताले जी का जन्म 1936 में मध्यप्रदेश के बैतूल ज़िले के जौलखेड़ा गाँव में हुआ था. मध्यप्रदेश के विभिन्न राजकीय कॉलेजों में अध्यापन करते हुए और फिर सेवानिवृत्त जीवन जीते हुए वे लगातार सृजनशील बने रहे. साठ के दशक में ही हिन्दी कविता के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर के रूप में उनकी पहचान क़ायम हुई, अलबत्ता पहला संग्रह सत्तर के दशक में शाया हुआ. अपने पचपन सालों से अधिक के साहित्यिक जीवन में उन्होंने 13 कविता-संग्रह और एक आलोचना-पुस्तक के अलावा एकाधिक संपादित और अनूदित पुस्तकें हिन्दी को दीं. जीवन से गहरा जुड़ाव, संघर्षों का ताप, विषयों की अद्भुत विविधता और अतिसाधारण चीज़ों से बड़ी कविता निकाल लाने वाली संवेदनात्मक तीक्ष्णता उनकी कविताओं की विशेषता है. उनके संग्रह हैं: हड्डियों में छिपा ज्वर (1973), दीवारों पर खून से (1975), लकड़बग्घा हँस रहा है (1980), रोशनी के मैदान की तरफ (1982), भूखंड तप रहा है (1982), आग हर चीज में बताई गई थी (1987), बदला बेहद महँगा सौदा (1995), पत्थर की बैंच (1996), उसके सपने (1997), इतनी पत्थर रोशनी (2002), उजाड़ में संग्रहालय (2003), जहां थोड़ा सा सूर्योदय होगा (2008), पत्थर फेंक रहा हूँ (2011). मुक्तिबोध पर मुक्तिबोध: कविता और जीवन-विवेक शीर्षक से उनकी आलोचना-पुस्तक है. मराठी के महत्वपूर्ण कवि दिलीप चित्रे की कविताओं का उन्होंने अनुवाद किया जो पिसाटी का बुर्ज़ नाम से पुस्तकाकार प्रकाशित है.

देवताले जी को अपने जीवन-काल में साहित्य अकादमी पुरस्कार समेत अनेक पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए. इनमें मुक्तिबोध फेलोशिप, माखनलाल चतुर्वेदी कविता पुरस्कार, मध्य प्रदेश शासन का शिखर सम्मान, सृजन भारती सम्मान, कविता समय पुरस्कार, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान और पहल सम्मान मुख्य हैं.

जनवादी लेखक संघ श्री चन्द्रकांत देवताले के महत्वपूर्ण योगदान को याद करते हुए उन्हें अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है.

— मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (महासचिव), संजीव कुमार (उप-महासचिव) द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के आधार पर.



औरत

वह औरत

आकाश और पृथ्वी के बीच

कब से कपड़े पछीट रही है,

पछीट रही है शताब्दिशें से

धूप के तार पर सुखा रही है,

वह औरत आकाश और धूप और हवा से

वंचित घुप्प गुफा में

कितना आटा गूंध रही है?

गूंध रही है मानों सेर आटा

असंख्य रोटियाँ

सूरज की पीठ पर पका रही है,

एक औरत

दिशाओं के सूप में खेतों को

फटक रही है

एक औरत

वक़्त की नदी में

दोपहर के पत्थर से

शताब्दियाँ हो गईं

एड़ी घिस रही है,

एक औरत अनंत पृथ्वी को

अपने स्तनों में समेटे

दूध के झरने बहा रही है,

एक औरत अपने सिर पर

घास का गट्ठर रखे

कब से धरती को

नापती ही जा रही है,

एक औरत अँधेरे में

खर्राटे भरते हुए आदमी के पास

निर्वसर जागती

शताब्दियों से सोयी है,

एक औरत का धड़

भीड़ में भटक रहा है

उसके हाथ अपना चेहरा ढूँढ रहे हैं

उसके पाँव

जाने कब से

सबसे

अपना पता पूछ रहे हैं.