जनवरी 10,11,12 को शान्तिनिकेतन के वोलपूर में करीब 40 लोकतान्त्रिक महिलाओं का एक सम्मेलन सम्पन्न हुआ, जिसे महिला सह चिंतन शिविर का नाम दिया गया. महाश्वेता देवी के जन्म के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर उनके संघर्ष को याद करते हुए, सह चिंतन के मंच का नाम महाश्वेता देवी मंच रखा गया था.
एक लम्बे अरसे बाद मुझे इस तरह के किसी सम्मेलन में भाग लेने का मौका मिला था. मैंने देखा कि सम्मेलन में बड़ी संख्या में आदिवासी महिलाएं शामिल थीं. आदिवासी महिलाओं का जमावड़ा सम्मेलन का सबसे रोचक विषय था. आज पर्यावरण के विनाश की जो हवा चल रही है, उसमें उनका जंगल छीना जा रहा है, जीवन छीना जा रहा है, इस कारण इनका संघर्ष, इनकी उपस्थिति बहुत महत्वपूर्ण लग रही थी.
सम्मेलन में शामिल महिलाओं में एक एकल महिलाओं की संस्था भी थी. उन महिलाओं ने एकल महिलाओं को संगठित कर एक संगठन बनाया हुआ था, जिनमें वे महिलाएं शामिल थीं, जो या तो विधवा थीं या परित्यक्ता या अकेली अविवाहित थीं.
किसी ने सवाल किया की जो महिलाएं ना तो विधवा हैं, ना परित्यक्ता वो भी तो एकल ही हुईं ना. इस बात का उन आदिवासी महिलाओं ने बड़े ही समझदारी के साथ उत्तर दिया. उनका कहना था कि किसी महिला के अकेले रहने का निर्णय उसका अपना व्यक्तिगत निर्णय हो भी सकता है, पर विधवा होना या परित्यक्ता होना किसी के खुद का निर्णय नहीं होता. हम सभी उनकी बातें सुनकर दंग रह गए. उन महिलाओं की समझदारी देखने लायक थी. ऐसा लगा जहां हम समझदारी की उम्मीद नहीं करते वहीं हमें सबसे ज्यादा मिलती है. इसके अलावा उनका गीत और संगीत कमाल का था. वे सभी महिलाएं खुल कर नृत्य कर रहीं थीं. कोई उनके बारे में क्या सोच रहा है या क्या कहेगा, इस बात से अंजान वे महिलाएं अपने नृत्य में मग्न थीं.
सम्मेलन की एक सबसे बड़ी बात मुझे यह लगी कि सारी महिलाएं अपने विचार, अपने अनुभव को खुलकर सबके सामने निःसंकोच रख रहीं थीं. सभी का खुलकर अपनी -अपनी बातों को रखना महिलाओं में बहनापे के भाव को बढ़ा रहा था. महिलाओं के अनुभव अनूठे थे, साथ ही उनके जीवन के एक से बढ़कर एक मिसाल देखने को मिल रहे थे. सबका एक साथ बैठकर खाना, पीना, उठना, बैठना, चर्चा करना, सब कुछ बहुत सुखद था.