15 नवंबर 2000 में झारखंड, अपनी भाषा और संस्कृति के आधार पर बिहार राज्य से अलग एक राज्य बना। यहाँ के आदिवासियों की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, इनकी परम्परा, इनकी जीवन शैली के कारण यह अपेक्षा थी, कि यह राज्य उन्नत बनेगा। लेकिन अलग राज्य बने 24 वर्ष पूरे होने के बाद भी स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है। कुछ मामलों में स्थिति और खराब ही हुई है। झारखंड राज्य की कई ऐसी प्रथा थी और आज भी है, जो स्त्रियों के खिलाफ है। जैसे डायन प्रथा का चलन यहाँ बहुतायत से है। आए दिन समाचार पत्रों में ऐसी घटनायेँ सुर्खियों में नजर आती है कि अमुक गाँव में एक महिला को डायन करार देकर, उसे गाँव में नंगा घुमाया गया, मैला खिलाया गया, सर के बाल काट दिये गए और अंततः कई बार तो उसे जान से भी मार दिया जाता है।

इस तरह की मान्यता के प्रचलित होने के कारण, एक गरीब स्त्री को गांवों में होने वाले किसी की मृत्यु, किसी बीमारी के लिये जिम्मेवार ठहरा दिया जाता है, और बस एक बहाना मिल जाता है, उसे अपमानित कर मार देने का। ऐसा भी देखा गया है कि ओझा अपनी जड़ी-बूटियों का असर होता न देख कर भी किसी औरत को डायन घोषित कर देता है। डायन घोषित स्त्री को पहले डराया जाता है, फिर प्रताड़ित किया जाता है, बाद में उसे मार भी दिया जाता है। यह प्रथा झारखंड के सुदूर गाँवों में ज्यादा प्रचलन में है।

डायन यानी एक ऐसी औरत जिसे अलौकिक शक्तियाँ ( जादू टोना ) प्राप्त हो, जो उन शक्तियों के बल पर दूसरों का बुरा ही कर सकती है। वैसे तो एक धारणा डायन के बारे में विश्व भर में सदियों से व्याप्त है, लेकिन कई समाज इस भूत, प्रेत, डायन जैसी धारणाओं से, इस अंधविश्वास से बदलते समय के साथ मुक्त भी हो रहे हैं। लेकिन झारखंड में यह आज भी रुकने का नाम नहीं ले रहा है। अगर आए दिन होने वाली ऐसी घटनाओं को देखा जाए तो यह स्पष्टता से दिखता है कि यह डायन प्रथा केवल अंधविश्वास और भय का नतीजा ही नहीं है। इस प्रथा को धड़ल्ले से वे लोग उपयोग में ला रहे है, जो अपने गाँव पड़ोस की किसी अकेली निरीह स्त्री की संपत्ति हड़पना चाहते हैं। उसे परेशान करना चाहते हैं, ताकि वह खुद ही परेशान होकर अपनी जमीन छोड़ कर कहीं और चली जाए। इन घटनाओं के अवलोकन से यह स्पष्ट दिखता है कि डायन करार दी गई औरत विधवा, निःसंतान, निरीह और उम्रदराज होती है।

झारखंड के परंपरागत कानून के तहत यहाँ स्त्रियों को संपत्ति अर्जित करने का अधिकार नहीं है। परिवार की संपत्ति पुरुषों के नाम होती है। हाँ यह अवश्य है कि एक स्त्री को जीवन भर उस संपत्ति के भोग का अधिकार है, भले ही वह उसे बेच नहीं सकती है। इस परंपरा का अभी तक भली- भांति पालन भी हो रहा है। ऐसे में अगर परिवार के पुरुष की मृत्यु हो जाती है, तो कई बार ऐसा भी देखा गया है कि कुछ पड़ोसी, चाचा, भतीजा लोगों की आँख उस जमीन पर टिक जाती है, जिसके भरोसे वह औरत अपने खाने-पीने और जिंदा रहने के प्रयास में जुटी होती है। ऐसे चालक, स्वार्थी, धूर्त लोग, समाज में फैले इस अंधविश्वास का फायदा उठाते है और सोचते हैं कि उसके जिंदा रहने तक कौन इंतजार करे। आज के आज मामले को निबटा देना चाहिए।

डायन घोषित शत- प्रतिशत मामलों में यह स्पष्ट देखने को मिलता है कि यह षड्यंत्र उस स्त्री की जमीन, संपत्ति हड़पने के लिये की गई थी। उसे सामाजिक रूप से बदनाम करने का प्रयास था ताकि वह स्त्री अपनी संपत्ति छोड़ कर कहीं भाग जाए। आए दिन कोई न कोई खराब घटना गांवों में घटती ही रहती है और उसके लिये उस निरीह महिला को दोषी घोषित कर दिया जाता है और कहानी ही खतम हो जाती है। धीरे-धीरे ऐसी निराश्रित महिलाओं से ‘मुक्ति’ पाने के लिये भी उन्हें डायन करार देने की कई घटनाएँ सामने आई हैं। इसके लिये बना बनाया एक रास्ता मौजूद है, उसे डायन कह दिया जाए।

थाना-पुलिस ऐसे मामलों की गंभीरता को जानते हुए भी इसे धार्मिक-सांस्कृतिक मामला कह कर टाल देती है। कई बार पुलिस की कार्रवाई को या सामाजिक कार्यकर्ताओं के हस्तक्षेप को रीति-रिवाजों और परंपरा पर आक्रमण कह कर पूरे मामले को जातीय रंग देने की कोशिश की जाती है। यह एक बहुत बड़ा सच है कि समाज का बड़ा हिस्सा इस तरह की मान्यताओं पर विश्वास करता है। ऐसे लोग यह भी मानते हैं कि जिनके पास बुरी शक्तियाँ हैं, उनके साथ क्रूरता कोई गलत काम या अपराध नहीं है।

अभी दो दिन पहले सुनीता विलियम नौ महीने स्पेस में रह कर धरती पर लौटी है, हम आज चांद पर जा रहें है, बुलेट ट्रेन चलाने की बात कर रहे हैं, डिजिटल इंडिया बन रहें है, इकोनोमी कैशलेस हो रही है, मगर समाज का यह अंधविश्वास खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। हमारा विश्वास, हमारी मान्यताएँ स्त्रियों को लेकर, आज भी वही सदियों पुरानी वाली बनी हुई है।

ऐसा नहीं कि इस समस्या के समाधान के लिए कुछ नहीं किया गया है। कानून बना कर इसे रोकने के साथ ही साथ सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से भी इसे समाप्त करने के कई प्रयास हुए हैं, लेकिन कुछ मुट्ठी भर लोगों के स्वार्थ के कारण यह अमानवीय कृत्य समाज से खत्म नहीं हो रहा है। आज समय आ गया है कि हम, हमारी सरकार डायन प्रथा के बारे में गंभीरता से सोचें और समाज को जागरूक करने की कोशिश करें।