गुमला जिला चारों ओर हरे-भरे पेड़-पौधे, जंगल, पहाड़, नदी, धार्मिक पर्यटन व ऐतिहासिक स्थलों से भरा पड़ा है. इन्हीं में से एक है गुमला जिले के डुमरी प्रखंड के अकासी पंचायत में स्थित सिरा सीता. यह झारखंड के गुमला जिले में आदिवासियों का एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है. इसे अलग-अलग नाम से जाना जाता है, जैसे-सीता नाले, ढबनी चुआं, धर्म कांडो, काकड़ो लाता. आदिवासियों का पूजा पद्धति प्रकृति से जुड़ा हुआ है. यहाँ हर साल फरवरी में एक बड़ा मेला लगता है, जिसमें झारखंड के अलावा बिहार, बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों से भी लोग आते हैं.

आदिवासी एक सरना धर्म के लोग हैं, जो प्रकृति से जुड़े हुए हैं और हर साल प्रकृति की पूजा करते हैं, ताकि जो भी हमारे पेड़ पौधे पहाड़, पर्वत, नदी नाला खेती बाड़ी हैं, वे सभी सुरक्षित रहें. उसको लेकर पूजा किया जाता है. उसमें कुड़ुख भाषा में ढोल, मंादर के साथ गाना गाते हैं. सरना धर्म के लोग पूजा के लिए अरवा चावल और जल का प्रयोग करते हैं. सिरा सीता रांची से लगभग 150 किलोमीटर दूर स्थित है. यह आदिवासियों का पवित्र स्थल माना जाता है. यहाँ राँची से हर साल जनवरी और फरवरी के महीनों में लोग जाते हैं. सिरा सीता जाने के लिए सभी लोग ऐसे समय में निकलते हैं कि वहां पांच से छह बजे पहुंच जायें. पूजा करने के लिए हजार फीट ऊपर पहाड़ी इलाका में जाना पड़ता है, जहां पर चारों ओर सखुआ का पेड़ है. वहीं पर है काकड़ो लाता- एक झील, जिसमें कभी भी पानी नहीं घटता, चाहे गर्मी का मौसम हो, चाहे कोई भी मौसम हो. उस पानी को आदिवासी समाज के लोग पवित्र जल मानते हंै.

लेकिन फिलहाल एक समस्या यह आ रही है कि आदिवासी समाज के लोगों को हिंदू कहा जा रहा है. ऐसा क्या कारण है जो आदिवासी समाज के लोग हिंदुओं की पूजा पद्धति को अपना कर पूजा करते हैं. मैंने बहुत सारे लोगों से जानकारी ली. उन्हें लगता है कि दुर्गा पूजा करने से घर में बेटा- बेटी अच्छे से रहते हैं. दीपावली पूजा करने से घर में मां लक्ष्मी प्रकट होती है. सरस्वती पूजा करने से बच्चों को शिक्षा मिलती है. उसके बाद तीज और जितिया से भी आदिवास प्रभावित हो रहे हैं. आदिवासी समाज के लोग कहते हैं कि जितिया, जो सन्तान की लंबी उम्र स्वस्थ की कामना के लिए किया जाता है, उसके बाद तीज, पति की लंबी उम्र के लिए किया जाता है. रामनवमी इसे भी सभी आदिवासी लोग मानते हैं, लेकिन मनाने के पीछे उन लोगों का अंधविश्वास हैं.

मेरा मानना यह है कि सदियों से जो आदिवासी समाज के पूर्वज लोग थे, वह पढ़े-लिखे नहीं थे और आदिवासी समाज के लोग इतने भोले भाले होते हैं कि लोगों की बात में बहुत जल्दी आ जाते हैं. शायद वह पढ़े लिखे ना होने के कारण लोगों की बात में जल्दी आ जाते हैं. समझने लगते हैं कि पूजा करने से यह हो जाएगा, पूजा करने से वह हो जाएगा. तो उन्होंने वही मान लिया. लेकिन कुछ लोग अब समझ चुके हैं कि वह हमारी पूजा पद्धति नहीं है. तो, बहुत लोग अब उस पूजा पद्धति में शामिल नहीं होते हैं. लोगों को अब समझना होगा कि हमारा जो धर्म है वह सरना धर्म है. हम प्रकृति पूजक हैं. हम सरना पूजा करते हैं, करमा पूजा करते हैं. आज आदिवासी गांवों में कोई भी व्यक्ति हिंदुओं का त्यौहार नहीं मानता है, लेकिन जो छोटे-छोटे शहर हैं, जहां पर हिंदू लोग सघन रूप में बसे हुए हैं, उसके आस-पास बसे आदिवासी घरों में हिंदू त्यौहार मनाये जाते हंै, पूजा किया जाता है.

इन्हीं सब को लेकर आज आदिवासियों से कहा जा रहा है कि तुम लोग हिंदू हो, सरकार भी उसे अलग धर्म कोड देने से इंकार कर रही हैं. आज एक स्टूडेंट अगर कोई फार्म भरता है तो उसमें उसका धर्म का कॉलम नहीं होता, उसे ‘अदर’ में टिक करना होता है. पूरा झारखंड आदिवासियों का है, लेकिन वही आदिवासी को आज अपने धर्म कोड को लेकर धरना में बैठना पड़ रहा है. सरकार से मांग करनी पड़ रही है, लेकिन केंद्र सरकार अलग कोड देने में बिलंब कर रही है.

जब सारे धर्म को एक कोड दिया गया है तो फिर आदिवासियों को आज तक कोड क्यों नही दिया गया? आखिरकार भेद- भाव क्यों? सरकार व लोगों को समझना होगा कि आदिवासियों की पूजा पद्धति अलग है, उनके धार्मिक स्थल अलग और प्रकृति के खुले आंगन में है.