23 मार्च के अपराह्न इस समूह के सदस्यों की हुई पहली बैठक में अनेक सदस्य पहली बार आमने सामने हुए. दो आस्थावान, एकाध संशयवादी, शेष बिना संशय के अनीश्वरवादी. बैठक देर से शुरू हुई और तय समय से पहले समाप्त हो गयी, इसलिए समूह के अगले कदम के बारे में कुछ तय नहीं हो सका. बैठक मूलतः परिचयात्मक रही. समय की कमी से चर्चा/ संवाद की गुंजाइश नहीं थी. फिर भी सबों ने खुले मन से अपनी बात रखी. दूसरों को धैर्य से सुना.

ईश्वर के बारे में हमारी धारणा क्या थी, कैसे बदल गयी, इस बारे में घोषित नास्तिकों- बीबी चौधरी, मेघनाद, इरशाद, करुणा झा, कुमार वरुण, मीरा झा, सीबी चौधरी, नंदिता, स्वाति (जो समूह की सदस्य नहीं है) और मैंने अपना अनुभव बताया.

सुब्रत पांडा नास्तिकता के करीब लगे. थोड़ा संशय, मगर कहा कोई ‘कंट्रोलिंग पावर’ है, इस बात को एकदम नहीं मानता. यह आशंका जतायी कि कहीं ‘नास्तिकता’ भी धर्म का रूप न ले ले.

प्रवीर पीटर ने कहा कि उनका किसी धर्म और ईश्वर में विश्वास नहीं है, मगर समाज और व्यक्ति पर धर्म के सकारात्मक प्रभाव को महसूस करते हैं; और एक हद तक उससे कोई आपत्ति भी नहीं लगती.

मेघनाद जी ने भी कुछ मिलती- जुलती बात कही. कहा- सामनेवाले को किसी भगवान को मानने से संतोष मिलता है, तो कोई हर्ज नहीं, पर धर्म और ईश्वर के नाम पर ‘जलेबी’ बनाने के धंधे से आपत्ति जरूर है. खुद को नास्तिक कहने में इनको कोई हिचक नहीं थी/है.

सुषमा चौधरी (शिक्षिका) परंपरागत आस्थावान हैं. चौधरी परिवार की बहू हैं तो ‘नास्तिकों’ के बीच रहते हुए उस विचार से भी अवगत हैं. कर्मकांड और संकीर्णता से दूर होती गयी हैं. ईश्वर पर पूर्ण आस्था है.

सीबी चौधरी को बचपन से अनुकूल माहौल मिला. पिता आजादी के आंदोलन में थे. समाजवादियों के करीब. ये भी उस धारा से जुड़ते गये, चुनौतियां भी झेलीं.

करुणा झा और मीरा झा बहन हैं; इनके परिवार का भी वैसा ही माहौल था! सुखद संयोग कि दोनों का विवाह दो नास्तिकों- सीबी चौधरी और बीबी चौधरी से हुआ, यानी करेला नीम पर…

फरहान ने धर्म, खास कर इस्लाम और मुसलिम समाज के दैनंदिन व्यवहार में विरोधाभास और वहीं से अपने विचारों में बदलाव, तर्कशीलता को आधार बनाने के अपने अनुभव और उसकी प्रक्रिया की जानकारी दी. एक बार फिर नास्तिकता और नास्तिकों से अपने मतभेद के बिंदुओं को रखा. कहा कि कोई ‘ज्ञान’ एब्सल्यूट (अंतिम सत्य) नहीं होता, नहीं हो सकता. परस्पर विरोधी दिखने वाले विचारों के टकराव और परस्पर संवाद से ही नयी चीजें निकलती हैं. मगर इस मुद्दे पर बहस का मौका नहीं था, तो समय के अभाव में चर्चा को टाल दिया गया. जिनको उनसे असहमति थी, उनको बोलने का मौका नहीं था.

कुल मिला कर आज की शुरुआत उत्साहवर्द्धक रही. इसमें जिनके विचारों को रखने में त्रुटि रह गयी हो, उनको यहां अपनी बात रखने का अवसर तो है ही.

‘आज का हासिल’ निषाद ख़ान को सुनना था. इस उम्र में इतनी साफ समझ, महज जोश में नहीं- इस्लाम सहित अन्य धर्मों, उनके विशिष्ट पात्रों के चरित्र और इतिहास की जानकारी हासिल करने के बाद एक राय पर पहुंचना- चकित करने वाला था.

एक बात पर सहमति बनी कि समूह के नाम में ‘सेकुलर’ जोड़ा जाये.

बैठक कोकर स्थित बीबी चौधरी के आवास (भारती क्लीनिक परिसर) पर हुई.