स्वतंत्रता संग्राम की एक अचूक नीति-रणनीति के रूप में ‘सत्याग्रह’ ने देश के आम जन में एक निष्ठा जगाई। आम जन को इतिहास की एक जागरूक, दायित्वयुक्त इकाई के रूप में सार्थकता प्रदान की। क्योंकि सत्याग्रह शब्द की गरिमा संकल्पयुक्त आचरण से समर्थित थी - ऐसे आचरण से जो गलत और सिद्धांतहीन समझौते करने के लिए तैयार नहीं था। ‘सत्याग्रह’ शब्द को गांधी की जीवन-दृष्टि, आचरण पद्धति और मूल्य समन्वित राजनीति ने नैतिक साहस का सम्बल प्रदान किया। साधन और साध्य के मामले में, सत्य के मामले में, और अन्य कितनी ही दिशाओं में उस जीवन-दृष्टि ने सिद्धांत के मामले में कोई या किसी भी तरह के समझौते से इनकार किया।

उस दौरान देश के चिन्तनात्मक और बौद्धिक क्षेत्र के वातावरण ने भी करवट ली। गांधी के नेतृत्व ने इतिहास की एक बहुत बड़ी चुनौती देश के सामने रखी। उनके ‘सत्याग्रही’ कृतित्व ने हर कदम पर यह संदेश दिया कि देश का हर आदमी समूचे देश का प्रतीक है। देश सिर्फ जमीन या नक्शे को नहीं कहते, देश का हर जीवित प्राणी मुजस्सम देश है। हर व्यक्ति सजीव हो इतिहास की प्रक्रिया में पूर्ण रूप से अपना दायित्व निभाने की कोशिश करेगा, तभी देश ‘स्वाधीन’ होगा। (धर्मवीर भारती)

गांधी के नेतृत्व के पहले ‘राजनीति’ सत्ता हस्तगत करने और उसे सुरक्षित रखने का कौशल मात्र मानी जाती थी - उसका जीवन के ‘शाश्वत’ नैतिक मूल्यों से कोई संबंध नहीं था। गांधी ने राजनीति को नैतिक मूल्यों से विच्छिन्न नहीं किया वरन् उसे बिना शर्त उनके अधीन रखा। - “मरण स्वीकार है, सारा देश मिट जाए, लेकिन हमारी निष्ठा की आन न जाने पावे - इस मूल्य-बोध के बिना राजनीति आत्मा का हनन कर डालती है। वह माया-जाल बनकर मनुष्य को उलझा देती है।”

गांधी युग में ‘सत्याग्रह’ के जरिये एक नयी जीवन-दृष्टि का उद्घाटन हुआ, जो तब तक की जीवन-दृष्टियों से कई मायनों में भिन्न थी। ‘सत्याग्रही’ दृष्टि ने राजनीति की ‘सत्ताग्रही’ दृष्टि को नया अर्थ पाने और ग्रहण करने के लिए प्रेरित किया। उस जीवन-दृष्टि में राजनीति न तो देश के यथार्थ से कटे हुए बुद्धिजीवियों का चिन्तन-विलास थी, न सत्ता हस्तगत कर उसे सुरक्षित रखने के प्रयास में संलग्न कूटनीतिज्ञों की कुटिलता थी। उसमें राजनीति एक मूल्यपरक साधना थी - इतिहास के संदर्भ में अपना दायित्व निभाते हुए कर्म के माध्यम से आत्मसाक्षात्कार और ‘स्व’ तथा ‘सर्व’ के एकात्म की प्रक्रिया थी। इसीलिए राजनीति की उस धारणा में ईमानदारी, सचाई और मूल्य-बोध का बहुत बड़ा स्थान था। आप बड़ा से बड़ा त्याग करते हैं, तो किसी पर एहसान नहीं करते। वह आप की आत्मा की पुकार है। आप उसे न सुनें तो नुकसान आपका है। आप बड़ी से बड़ी गलती भी कर जाएं तो उसे निहायत ईमानदारी से स्वीकार करने में आपका कुछ नहीं जाता। गलती करना और उसे मुक्तकंठ से स्वीकार कर लेना आत्म-पथ के एक पथिक को आन्तरिक दृष्टि से और भी सम्पन्न बना जाता है। वह अनुभव समृद्ध हो जाता है।

हां, गांधी ने जब कभी अपने को पृथक महसूस किया और उनकी जनता से ठनी, उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे सत्य की ओर रहेंगे। अगर वे नहीं समझ पा रहे थे, तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि उन्हें सत्य नहीं दीख रहा है। वे चिन्तन करेंगे, आत्मशुद्धि करेंगे। लेकिन जब तक वे उसे सत्य नहीं मान लेते, तब तक वे कोई भी पथ नहीं अपनाएंगे, चाहे इससे लोकप्रियता घटे या बढ़े। जाहिर था, जनता से गांधी की पृथकता और अन्तरंग एकसूत्रता दोनों ही सत्य के परिप्रेक्ष्य में, सत्य के आग्रह के लिए थीं। इसलिए वे अपनी बड़ी से बड़ी भूल को स्वीकार करने में पल भर भी हिचकिचाते नहीं थे। उनकी भूल स्वीकृति भी आन्तरिक विकास की एक नयी, आगे ले जानेवाली, कड़ी बन जाती थी।

इसका एक ‘क्लाइमेक्स’ आजादी के पूर्व 1942 में नजर आ गया। सन् 1942 में देश नेतृत्वहीन छूट गया था। और, कारागार में जाते हुए गांधी कह गये कि हर व्यक्ति स्वयं अपना नेता है। और तब जनता की सीधी कार्रवाइयों ने सत्य के आग्रह का नया और अभूतपूर्व इतिहास रचा। उस इतिहास में देश की जनतांत्रिक परम्पराओं और सामान्यजन के स्वस्थ मूल्यबोध, अदम्य नैतिक साहस और अपराजेय स्वातंत्र्य आकांक्षा के रूप में सत्याग्रही गांधी के प्रभाव की जो झलक मिली, उससे वे प्रभुजन भी, जो बनते इतिहास की अपनी-अपनी व्याख्या संदेश रूप में जनता को दे रहे थे, स्तब्ध रह गये! क्योंकि उस वक्त उन्हें मालूम हुआ कि खुद उनको और अन्य प्रभुओं को गरिमा और सार्थकता प्रदान करनेवाला यही सामान्य जन है। (इनमें गांधी के अनुयायी भी शामिल थे, भावी उत्तराधिकारी भी, और विरोधी भी। आज भी उस इतिहास के वाहक प्रभुओं में वह स्तब्धता कायम है)।

यही नहीं, 42 की अगस्त-क्रांति के दौरान आजादी के आंदोलन की राजनीति में नेतृत्व के स्तर पर अपनी अलग (व्यक्ति केन्द्रित) नीति और रणनीति चलानेवाले विशिष्ट जनों ने पाया कि वे इतिहास की मूल गति से कट गए, जबकि जनता उस इतिहास-प्रक्रिया की एक-एक गति से अधिक अन्तरंग थी - उसे अधिक संवेदनशीलता से ग्रहण कर रही थी। जनता ने गांधी के इस स्टैंड को आत्मसात करते हुए कि ‘सारी सविनय अवज्ञाएं सत्याग्रह का अंग होती हैं, लेकिन सारे सत्याग्रह सविनय अवज्ञा नहीं होते’, अहिंसा और हिंसा दोनों तरह के मोर्चे संभाले। उसने ‘अगस्त-क्रांति’ की कमान अपने हाथ में लेकर गांधी के ‘करेंगे या मरेंगे’ के आह्वान को ‘जनता-राज’ की परिणति तक पहुंचा दिया! उसने ‘करेंगे या मरेंगे’ को यह अर्थ दिया : “नारा लगाते जेल जाना नहीं, जान हथेली पर रखकर ब्रिटिश दासता के प्रतीकों एवं उस दासता का संचालन-पोषण करने वाली संस्थागत सत्ता-संरचनाओं को ध्वस्त करना, और वहीं डटे रहकर मृत्यु की आंखों में आंख डालकर उसे चुनौती देना।” ब्रिटिश हुकूमत को उसी वक्त यह महसूस हो गया कि “जल्द ही हमें यहां से जाना होगा। अब सिर्फ नेताओं को जेल में बंद कर या उन्हें सजा देकर और दमन-चक्र तेज कर देश पर राज करना संभव नहीं, क्योंकि देश की जनता खुद नेता बन गयी है।”

कुल मिलाकर, वर्ष 1917 में चम्पारण से शुरू कर लगभग तीस वर्ष तक सत्यनिष्ठ गांधी ने स्वाधीनता आंदोलन के दौरान सत्याग्रह के विविध प्रयोगों, प्रयासों, व्यूह-रचनाओं और प्रक्रियाओं से देश में व्यापक जनजागरण पैदा की। सूखी हड्डियों में भी नई जान आयी और अंग्रेजी साम्राज्यवाद की जड़ हिल गयी। उनके नेतृत्व में ‘सत्याग्रह’ के रूप में प्रकट संघर्ष की विविध और सीधी कार्रवाइयों का विभिन्न राजनीतिक धाराओं, देश के विभिन्न क्षेत्रों में कई स्तरों पर सक्रिय नेतृत्वकारी शक्तियों सहित आम-जन की चेतना, उसकी सहभागिता और भूमिका पर व्यापक और गहरा प्रभाव पड़ा।