मुझे सरहुल अच्छा लगता है. यह एक ठोस प्रमाण भी हिंदुओं से आदिवासियों की भिन्नता का. यह किसी भी रूप में हिंदुओं के पर्व त्योहारों की तरह बधोत्सव नहीं. किसी की हत्या या विजयोत्सव का पर्व नहीं. प्रकृति के साथ साहचर्य और समागम का पर्व है. इस पर्व में भी अब सड़कों पर शोभा यात्रा निकलती है. रंगीन साड़ियों व परंपरागत परिधानों को पहने आदिवासी स़्ित्रयों- पुरुषों की टोली, जिसमें सभी वय के लोग होते हैं, सड़कों पर निकलते हैं. निकट के सरना स्थलों पर जाते हैं. पूरा रांची शहर पट जाता है नाचते गाते लोगों से.

लेकिन इस शोभा यात्रा से शहर में सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने का खतरा नहीं होता, न किसी तरह की आशंका से जहां- तहा पुलिस बल की भारी तैनाती ही होती है. अब तो कुछ वर्षों से ग्लोबल वार्मिंग की वजह से धूप तपने लगी है, लेकिन पर्व उस वक्त होता है जब प्रकृति नये परिधान धारण करती है, मंद-मंद सुगंधित बयार बहती है और आकाश पलास के लाल-लाल फूलों से भर जाता है. पर्व तो है, धार्मिकता का थोड़ा सा पुट भी, लेकिन सरहुल गीतों में प्रकृति के अवदानों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन ही होता है और पूरे जगत के लिए शुभेच्छा. तो, आईये सरहुल का आनंद मनाये और सरहुल की उदात्त भावना का भावन करें.

सरहुल आह्वान:

देश से भूख गरीबी

धरती से मूर्ख -बुद्धि

जड़ से उखड़ जायें

समूल नष्ट हो जायें.

स्रोत: आदि धर्म

सबों को सरहुल की शुभकामनाएं.