पेसा कानून के संदर्भ में रूढ़ी प्रथा की चर्चा प्रासांगिक है. संविधान के अनुच्छेद 13-3-क के तहत भारत के अनुसूचित क्षेत्र में विधि का बल रखने वाला रूढ़ी प्रथा है. हालांकि पांचवी अनुसूचि के तहत भी रूढ़ी प्रथा की सुरक्षा की गारंटी की गयी है. लेकिन बहुत सारे लोग समझ नहीं पाते कि रुढ़ी प्रथा है क्या? मैं भी ठीक-ठीक समझ नहीं पाया हूं. जितना समझ पाया हूं, वह यह कि सामाजिक जीवन को अनुशासित रूप से चलाने के लिए परंपरा से हम जिन नियमों का पालन करते आ रहे हैं और जो हमारी चेतना से बद्धमूल हो गया है, वही रुढ़ी प्रथा है. जन्म, मृत्यु, विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, बच्चे को गोद लेने आदि के लिए समुदाय विशेष जो नियम गढ़ता है और पुश्त दर पुश्त जिसका पालन करता आया है, वही रूढ़ी है और रूढ़ी का समुच्च ही रूढ़ी प्रथा है.

रूढ़ि वैज्ञानिकता और तर्क की कसौटी पर खरा हो, यह जरूरी नहीं. हां, उसके पीछे वैज्ञानिकता और तार्किकता हो भी सकती है. लेकिन यह मूलतः मान्यताओं और आस्था पर टिकी है. एक दूसरी बात यह कि सिर्फ आदिवासी समाज रुढ़ी या रूढ़ी प्रथा से संचालित नहीं होता, बल्कि हर समुदाय में रूढ़ियां होती है, कुछ ऐसी मान्यताएं होती हैं, जीवन के कुछ रीति रिवाज होते हैं, जिनका पालन वह आंख मूंद कर करता है. इसे ही हम पर्सनल लाॅ के रूप में जानते हैं और इसकी सुरक्षा की गारंटी अब तक संविधान करता आया है. अब भाजपा समान नागरिक संहिता के द्वारा इसे समाप्त करने की दिशा में बढ़ रही है.

लेकिन पहले हम यह जाने की यदि किसी समुदाय में रूढ़ि प्रथा को लेकर कुछ विवाद हो, या समुदाय विशेष का कोई व्यक्ति उसे मानने के लिए तैयार न हो, तो क्या होता है? एक तो समाज रुढ़ी प्रथा का विरोध करने वाले व्यक्ति विशेष को दंड देता है, लेकिन यह भी होता है कि कोई पक्ष कोर्ट में चला जाता है. और तब फैसला कोर्ट करता है. सर्वोच्च न्यायालय ने सन् 2001 में डा. सूरजमणि स्टेला कुजूर बनाम डा. दुर्गा चरण हांसदा के फैसले में कहा कि यदि पक्षकार अपने सामाजिक रीति रिवाजों / रुढ़ियों का पालन करता हो तो चाहे वे किसी अन्य धर्म/मत को क्यों न मानते हों, उन पर प्रथागत कानून ही लागू होंगे.

लेकिन इसके विपरीत यदि अदालत में यह प्रमाणित होता है कि आदिवासियों ने अपने रुढ़ी प्रथा और रीति रिवाजों का पालन छोड़ दिया हो और हिंदू जीवन शैली को अपना लिया हो, तो ऐसी स्थिति आदिवासियों पर भी हिंदू कानूनों को लागू किया जा सकता है. अब कोर्ट में बहुधा यह प्रमाणित करना मुश्किल होता है कि वादी रूढ़ियों/ प्रथाओं का पालन कितना करता है. इसे ठोस उदाहरणों से समझा जा सकता है. मान लीजिये कि आदिवासी परिवार की कोई बेटी अपने पिता की संपत्ति में हिस्सेदारी का दावा करे, तो यह कहना काफी नहीं होगा कि हमारे समाज में बेटियों को संपत्ति का अधिकार नहीं. आपको यह प्रमाणित करना होगा कि आपके परिवार में आदिवासी परंपराओं को पालन होता रहा है.

कोर्ट के सामने एक मामला यह भी आया था कि किसी आदिवासी पुरुष ने एक पत्नी के होते, दूसरा विवाह कर लिया. वादी ने कोर्ट से कहा कि उनके समुदाय में बहुविवाह का रिवाज नहीं. लेकिन कोर्ट ने उनकी नहीं सुनी, क्योंकि वे यह प्रमाणित नहीं कर सके कि उनके समुदाय में दूसरा विवाह करना मान्य नहीं. उनके पति को कोर्ट ने दोषमुक्त करार दिया.

आदिवासी धर्म के मामले में तो अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के आयुक्त ने 1961-62 के अपनी ग्यारहवीं रिपोर्ट में कह दिया कि जनजातियों के मामले में धर्म सारहीन है और अनुसूचित जनजाति का सदस्य धर्म बदलने के बाद भी आदिवासी बना रहेगा. अब इस वक्तव्य का साकारात्मक पक्ष भी है और नकारात्मक पक्ष भी. नकारात्मक पक्ष यह कि आदिवासियों के धर्म को सारहीन बताना. क्योंकि इसका खतरा यह है कि उसे किसी भी दूसरे धर्म में आसानी से शुमार कर लिया जा सकता है. अब जो आदिवासी ईसाई धर्म को अंगीकार कर चुके हैं, उससे अलग आदिवासियों की गणना आसानी से हिुदू धर्म को मानने वालों में कर लिया जा सकता है.

वैसे, जैसा कि मैंने शुरु में कहा कि रुढ़ियां अन्य समुदायों में भी होती हैं. हिंदू धर्म में सती प्रथा थी, विधवा विवाह मान्य नहीं था, यह एक सामान्य धारणा थी कि लड़की के राजस्वला होने के पहले उसका विवाह कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि स्त्री के मन में प्रेम की भावना का अंकुरण हो, इसके पहले ही उसके लिए यह सुनिश्चित कर दिया जाना चाहिए कि वह किससे प्रेम करे. लेकिन इन तमाम मान्यताओं के खिलाफ विद्रोह हुआ, सांस्कृतिक जनजागरण हुआ और अब सती प्रथा नहीं है, विधवा विवाह भी होने लगे हैं और संविधान में ही यह सुनिश्चित कर दिया गया है कि लड़की का विवाह बालिग होने के बाद ही हो.

इसलिए हमें मान कर चलना चाहिए कि समय के साथ परंपरायें टूटती हैं, बदलती है और रूढ़ियों में भी बदलाव हो सकता है. महत्वपूर्ण सवाल यह है कि कौन सी मान्यताएं, परंपरायें और रूढ़ियों के रूप में बदल चुकी प्रथाएं समयानुकूल है या नहीं और यह फैसला कौन करेगा?