किसी लड़की को गलत ढंग से छूना, उसके पैजामे का नाडा खोलना और उसे किसी पुलिया के नीचे ले जाना बलात्कार या बलात्कार की तैयारी नहीं कही जा सकती. अधिक से अधिक उस लड़की को निवस्त्र करने की क्रिया कही जा सकती है. 17 मार्च के दिन यह फैसला दिया था इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज राम मनोहर नारायण मिश्रा ने. इस फैसले के बाद देश भर में इसके विरुद्ध प्रतिक्रियायें आनी शुरू हो गयीं . महिला संगठनों का कहना था कि इस फैसले से एक गलत परंपरा बनेगी. महिलाओं के साथ अनाचार और अपराधिक घटनाओं में वृद्धि होगी. इसलिए तत्काल सुप्रीम कोर्ट को इसका संज्ञान लेकर इस फैसले पर रोक लगानी चाहिए और उचित न्याय देनी चाहिए.
घटना 10 नवंबर 20 21 की है. उस दिन ग्यारह वर्ष की अपनी बेटी के साथ एक महिला अपना घर लौट रही थी. रस्ते में दो लडके मोटरसाइकिल पर जाते हुए उस महिला के पास रुके और उन्होंने उसकी बेटी को मोटरसाइकिल पर चढ़ाकर घर तक पहुंचा देने का प्रस्ताव रखा. मां ने उन दोनों लड़कों को अपने ही गांव का पाकर अपनी बेटी को उनके साथ जाने दिया. आधा रास्ता तय करने के बाद उन लड़कों ने उस लड़की को गलत ढंग से छूना शुरू किया, उसके पैजामे का नाडा खोल दिया और उसे घसीटते हुए एक पुल के नीचे ले जाने लगे. लड़की ने शोर मचाना शुरू किया. उसी समय रास्ते पर एक ट्रैक्टर पर जाते हुए दो व्यक्ति लड़की की चीख सुन कर पुल के नीचे पहुंचे.
लेकिन तब तक वे दोनों लड़के भाग चुके थे. दूसरे दिन लड़की की मां उन लड़कों की शिकायत करने उनके पिता के पास गयी तो उनके पिता ने महिला को मार डालने की धमकी देकर भगा दिया. तब महिला पुलिस स्टेशन शिकायत लेकर पहुंची. पुलिस ने उसकी नहीं सुनी. अन्त में वह महिला जनवरी 2022 की अपनी शिकायत लेकर कोर्ट पहुंची. लोअर कोर्ट ने जून 2023 में इस केस को सुनवाई के लिए स्वीकार किया और इसे पोस्को कोर्ट को सौंपा. पोस्को कोर्ट ने पिता सहित दोनों लड़कों को अपराधी माना. लडकों के ऊपर बलात्कार की कोशिश करने की धाराएं लगी और पिता के ऊपर अपराध की धाराएं लगी. इसके विरुद्ध अपराधी इलाहाबाद हाईकोर्ट गये. इसीका फैसला देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज राम मनोहर मिश्रा ने उक्त ऐतिहासिक फैसला दिया.
यह फैसला फरवरी महीने में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले की तरह ही चर्चा का विषय बना और विरोध का भी शिकार हुआ. इसका विरोध केवल महिलाएं हीं नहीं बल्कि सांसद, विधायक तथा मंत्री तक कर रहे है. छत्तीसगढ़ हाइकोर्ट ने तो पति पत्नी के संबंधों में यह स्थापित कर दिया कि पति को पत्नी से शारीरिक संबंध बनाने के लिए पत्नी की सहमति की जरूरत नहीं है. यह एक पितृसत्तात्मक समाज की सोच का परिणाम है जिसमें जबरदस्ती संबंध बनाने के कारण पत्नी की मृत्यु हो जाती है और पति निर्दोश साबित हो जाता है. इसी तरह इस ग्यारह वर्षीया लड़की के साथ अभद्र और अश्लील हरकतों को जज साहब बहुत हल्के से लेते हैं. उनको लड़कों की नीयत में कोई खोट नजर नहीं आती. उन्हें लगता है कि वे केवल अपना मनोरंजन करने के लिए उसे निवस्त्र कर रहे थे. जो कोई महान अपराध नहीं है. जज साहब शायद यह कहना चाह रहे हों कि इस तरह की छोटी-मोटी गलतियां करना तो उनका अधिकार है. यहां भी वही पितृसत्तात्मक सोच ही व्यक्त होती है. महिलाओं के प्रति संवेदनहीन समाज में ऐसे कोर्ट और जज इसी तरह के फैसले देते रहेंगे और महिलाओं के सम्मान को चोट पहुंचाते रहेंगे.
जजों की कहानी को आगे बढ़ायें तो उनकी चरित्रहीनता की एक और घटना हमारे सामने आती है जो हमारी न्याय व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करती है. खबर आयी कि इलाहाबाद के एक जज के घर में लगी आग को बुझाते समय बहुत बड़ी मात्रा में रुपये बरामद हुए. रुपयों की इतनी बड़ी मात्रा का पाया जाना इस ओर इंगित करता है कि वह जरूर कोई भ्रष्टाचार का मामला है. क्योंकि कोई भी जज अपने सीमित वेतन से इतनी बड़ी मात्रा में रूपये जमा नहीं कर सकता है और जमा करेगा भी तो घर में छुपा कर नहीं रखेगा. कहीं यह राशि गलत फैसलों से प्राप्त घूस की तो नहीं है. अभी तो यह अनुमान ही है जांच के बाद ही पता चलेगा. लेकिन यह संभावना तो बनती ही है. इस ग्यारह वर्षीय गरीब लड़की के फैसले में भी समाज के ताकत वर लड़कों को बचाने के लिए जज साहब ने इस तरह की किसी संभावना की अपेक्षा की हो.
उक्त दोनों फैसले महिलाओं को न्याय देने में असमर्थ तो हैं ही. साथ ही महिलाओं के लिए न्याय पाने के अंतिम द्वार, न्यायव्यवस्था को भी उनसे दूर करता है.