आदिवासियों की जमीन की लूट थम नही रही. कांके डैम साईड के अधिकतर खेत बिक चुके हैं. कांके डैम, उसके नीचे पतरागोंदा और नदी के बीच फैली विस्तृत जमीन यदि अब तक बची रह गयी है तो बस इसलिए कि उधर अभी आवागमन की सुविधा नहीं. लेकिन पिछले दिनों जमीन से जुड़े दलालों और उनके सरगनाओं की बैठक हुई और बीच में गुजरती नदी या कहिये नाले के उपर एक पुल बनाने का निर्णय हुआ और पुल बनते ही जमीन के उस हिस्से की भी खरीद बिक्री शुरु हो जायेगी.

कांके रोड पर गांधीनगर गेट के सामने से एक सड़क जयपुर तक चली जाती है. उस सड़क के चैड़ीकरण के बाद उसके दोनों तरफ की जमीन बिकनी शुरु हो गयी. और देखते देखते दोनों तरफ की जमीन लगभग बिक चुकी है. अब कांके डैम से उतरी नदी और नाले तथा जयपुर जाने वाली सड़क के बीच की बची खुची जमीन पर लोगों की नजर है. चूंकि उस तरफ से पतरागोंदा जाने के रास्ते एक नदी पड़ती है, इसलिए उधर की जमीन अभी तक बची हुई थी. गांव वालों को जाने आने में कोई दिक्कत नहीं थी, क्योंकि अंग्रेजों के जमाने का बने एक पुराने बांध का अवशेष बचा था और उधर से लोग आते जाते थे.

लेकिन इधर कुछ लोगों ने नदी पर एक पुलिया बनाने का प्रस्ताव सामने रखा और विकास के नाम पर सबों की सहमति भी बन गयी. लेकिन वास्तविकता यह है कि पुल बनने से नदी पार होने के लिए रास्ता तो सुगम हो जायेगा, पर जो खेत नदी के उस पार बचा हुआ है, वह भी बिक जायगा. सभी जगह गैर-आदिवासी बस जायगे. और यह सब छोटानागपुर टीनेंसी एक्ट के बावजूद होगा. झारखंड एक ऐसा राज्य बन गया है जहां पर कोई पाबंदी नहीं. तमाम कानून के बावजूद यह सब हो रहा है.

शहरी इलाकांे में जो बस्ती हैं, खेत खलिहान हैं, सब लुप्त होते जा रहे हैं. यह सब कैसे हो रहा है, यह समझना बेहद मुश्किल हैं. कहते हैं जितने भी गैर आदिवासी समाज के लोग जो आदिवासियों की जमीन पर बसे हुए हैं, वेे बस एक सफेद कागज के जरिये टिके हुवे हैं क्योंकि एक आदिवासी की जमीन को एक आदिवासी ही खरीद सकता है. कोई गैर आदिवासी आदिवासी की जमीन खरीद सके, इसका कोई आधार ही नहीं बनता है.

यह सब जानते देखते भी झारखंड की अबुआ सरकार यहाँ के लोगों के हितों की रक्षा नहीं कर पाती. रिंग रोड के नाम पर आदिवासियों की जमीन का अधिग्रहण हो रहा है. आस पास के जंगल विलुप्त हो रहे हैं. जमीन बिकने का यही यही रफ्तार रहा तो एक दिन जल जंगल जमीन का अस्तिव ही मिट जाएगा.