हम (श्रोता): हिंदुत्व का दर्शन क्या है? आपका अध्ययन क्या कहता है? क्या ‘हिंदू धर्म का दर्शन’ और ‘धर्म का दर्शन’ शीर्षक एक समान हैं?

डॉ. अंबेडकर (वक्ता): आपके दो प्रश्न हैं। पहला तो ऐसा प्रश्न है, जो तार्किक विचार श्रृंखला में उत्पन्न होता है, परंतु तार्किक श्रृंखला के अलावा भी एक प्रश्न है, जिसका इतना महत्व है कि इसे बिना विचार किये छोड़ा नहीं जा सकता। इसके बिना ‘हिंदुत्व’ के उद्देश्यों और आदर्शों को कोई भी समझ नहीं सकता। इसलिए पहले विषय की पृष्ठभूमि को स्पष्ट करना और साथ ही उससे संबंधित शब्दावली को परिभाषित करना बहुत आवश्यक है। दूसरे प्रश्न से जुड़े विषय पर भी मैंने बहुत-कुछ पढ़ा है, लेकिन मैं स्वीकार करता हूँ कि मुझे ‘धर्म का दर्शन’ का स्पष्ट अर्थ अभी तक नहीं मिल पाया है।

हम (श्रोता): क्यों?

डॉ. अंबेडकर (वक्ता): इसके पीछे शायद दो कारण हो सकते हैं। पहला यह कि धर्म की एक सीमा निश्चित है, लेकिन दर्शनशास्त्र में किन-किन बातों का समावेश किया जाए, यह निश्चित नहीं। दूसरे, ‘दर्शन’ और ‘धर्म’ परस्पर विरोधी न भी हों, उनमें ‘प्रतिस्पर्धा’ तो अवश्य है।

हम (श्रोता): दर्शन और धर्म परस्पर विरोधी न होने पर भी दोंनों में प्रतिस्पर्धा है? इसका क्या माने? ‘हिंदू’ धर्म और ‘हिंदुत्व’ का दर्शन में क्या प्रतिस्पर्धा है?

डॉ. अंबेडकर (वक्ता): एक कहानी बहुत प्रचलित है। उस कहानी के अनुसार एक बार एक दार्शनिक और एक अध्यात्मवादी के बीच वाद-विवाद हुआ। वाद-विवाद के दौरान, अध्यात्मवादी ने दार्शनिक पर यह दोषारोपण किया कि वह एक ‘अंधे’ पुरुष की तरह है, जो अंधेरे कमरे में एक काली बिल्ली को खोज रहा है, जो वहां है ही नहीं। प्रतिक्रियास्वरूप दार्शनिक ने अध्यात्मवादी पर आरोप लगाया कि वह एक ऐसे अंधे व्यक्ति की तरह है, जो अंधेरे कमरे में एक काली बिल्ली को खोज रहा है, जबकि बिल्ली का वहां कोई अस्तित्व है ही नहीं।

हम (श्रोता): डॉ. साहेब, आप जिस लहजे में जवाब दे रहे हैं, उससे लगता है आप कोई गंभीर ‘दृष्टिकोण’ प्रस्तुत कर रहे हैं। यह महज हास्य-व्यंग्य नहीं है। लेकिन हमारा प्रॉब्लम ये है कि हम अब ‘प्रॉब्लम’ शब्द के तीन हिंदी शब्द - सवाल, समस्या और संकट - में घिर गये हैं। हमारे अंदर तीनों शब्दों का त्रिभुज-घेरा जितना कस रहा है, उतना ही बाहर ‘कंफ्यूजन’ क्रियेट हो रहा है और उसका दायरा बढ़ रहा है। अब आलम है कि हर नया जवाब तत्काल तो अतीत के पुराने जवाब को समझने का सूत्र लगता है - पुराने संदूक को खोलने की ‘चाबी’ जैसा, लेकिन दूसरे ही पल वह उस पर ‘कंफ्यूजन’ का ऐसा ताला लगाता दिखता है, जिसकी चाबी भविष्य में कहीं गुम है। सो हमारा ‘वर्तमान’ अतीत के दबाव और भविष्य के खिंचाव में यूं फंस गया है कि हम अपने आप में आर.के. लक्ष्मण के ‘कार्टून’ जैसे हो गये हैं। इसलिए फिलहाल आप सरल और स्पष्ट तरीके से बताने की कृपा करें कि, हिंदू धर्म के दर्शन के अध्ययन से आपका संबंध किन बातों से है?

डॉ. अंबेडकर (वक्ता): ठीक है, तो मैं इस सवाल से अपनी बात शुरु करता हूं कि ‘दर्शन’ का मूल अर्थ क्या है? मेरी समझ से इसके दो अर्थ हैं। एक अर्थ है - उपदेश, जैसा कि लोग सुकरात और प्लेटो के दर्शन के बारे में कहते हैं। दूसरे अर्थ में, इसका तात्पर्य है, किसी भी विषय तथा घटना पर निर्णय देते समय सूक्ष्म विवेक-बुद्धि का प्रयोग करना। इस आधार पर मैं कहता हूं कि ‘धर्म का दर्शन’, केवल वर्णनात्मक शास्त्र नहीं है। मैं उसे वर्णनात्मक और नियमबद्ध शास्त्र दोनों मानता हूँ। जहाँ तक उसका धर्म के उपदेश के साथ संबंध है, धर्म का दर्शन केवल वर्णनात्मक शास्त्र बनता है, परंतु जब उसका संबंध उन उपदेशों पर निर्णय लेने के लिए सूक्ष्म विवेक-बुद्धि का उपयोग करने से होता है, तब धर्म का दर्शन एक नियमबद्ध शास्त्र बनता है।

हम (श्रोता): क्या आपके कहने का आशय यह है कि हिंदू धर्म का दर्शन हिंदुओं की जीवन शैली से बंधा है। और आप उनकी जीवन शैली के आधार पर ही उसके दर्शन के सूत्र रेखांकित करना चाहते हैं?

डॉ. अंबेडकर (वक्ता): हां, स्पष्टतः मैं हिंदू धर्म का विश्लेषण जीवन शैली के रूप में, उसमें छिपे महत्व को निर्धारित करने के रूप में, करूँगा। लेकिन इसका एक पहलू और है, जिसका स्पष्ट होना शेष है। इसका संबंध इसीके नजदीकी अंगों की जाँच करने से है, और जिन शब्दों का प्रयोग मैं करूँगा, वह उनकी परिभाषाओं से संबद्ध है।

हम (श्रोता): तब तो पहले यह बताइए, आपने यह विचार किया कि हिंदुओं के ‘धर्म’ की कोई परिभाषा निश्चित है, जिससे हम परस्पर-विरोधी तर्क-वितर्कों को टाल सकें, उनसे बच सकें?

डॉ. अंबेडकर (वक्ता): मेरे विचार में धर्म के दर्शन के ‘अध्ययन’ में तीन आयामों का होना आवश्यक है। मैं उन्हें आयाम कहता हूँ, क्योंकि वे उन अज्ञात अंशों के समान हैं, जिनका उत्पादन के अंगों में समावेश होता है। यदि हम धर्म के दर्शन के परीक्षण का कोई नतीजा निकालना चाहते हैं, तब हमें उन आयामों की जाँच करके उनकी व्याख्या निश्चित करनी होगी। इन तीन आयामों में प्रथम है - धर्म। धर्म की परिभाषा से हम क्या समझते हैं, इसे निश्चित करना आवश्यक है। यह बात धर्म के संबंध में विशेष रूप से आवश्यक है, क्योंकि उसकी निश्चित व्याख्या के बारे में सहमति नहीं हैं। वैसे, इस प्रश्न पर विस्तार से चर्चा करने की आवश्यकता भी नहीं। इसलिए इस शब्द का प्रयोग मैं जिस अर्थ में यहाँ कर रहा हूँ, उसे स्पष्ट करने से ही मेरा समाधान हो जाएगा। धर्म शब्द का प्रयोग मैं ‘ब्रह्मविज्ञान’ के रूप में करता हूँ। शायद व्याख्या की दृष्टि से इतना ही कहना पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि ब्रह्मविज्ञान भी अलग-अलग तरह का है और मुझे वह सब स्पष्ट करना चाहिए। प्राचीनकाल से ही ऐतिहासिक दृष्टि से जिनकी चर्चा की जाती रही है। ऐसे ब्रह्मविज्ञान दो तरह के हैं - ‘पौराणिक’ ब्रह्मविज्ञान और ‘लौकिक’ ब्रह्मविज्ञान। ‘पौराणिक’ ब्रह्मविज्ञान के ‘साहित्य’ (काल्पनिक) में देवी-देवता और उनके कार्यकलाप की कहानियाँ हैं। लौकिक ब्रह्मविज्ञान में विभिन्न त्योहार तथा समारोह और उनसे संबंधित रीति-रिवाजों की जानकारी का समावेश है। मैं इन दोनों अर्थों के अनुरूप ब्रह्मविज्ञान शब्द का प्रयोग नहीं कर रहा हूँ। मेरे अनुसार ब्रह्मविज्ञान का अर्थ है, ‘नैसर्गिक’ ब्रह्मविज्ञान, जो ईश्वर और ईश्वरीय उपदेशों का सिद्धांत हैं। यह ब्रह्मविज्ञान नैसर्गिक ‘प्रक्रिया’ का ही एक अविभाजित अंग है। वैसे, आपको बता दूँ कि प्लेटो ने नैसर्गिक ब्रह्मविज्ञान को एक विशिष्ट अध्ययन के रूप विकसित किया। खैर, पारंपारिक और रूढ़ अर्थ में नैसर्गिक ब्रह्मविज्ञान तीन सिद्धांतों का प्रतिपादन करता है - (1) ईश्वर का अस्तित्व है और वह विश्व का निर्माता है (2) प्राकृतिक रूप में होने वाली सभी घटनाओं पर ईश्वर का नियंत्रण है, और (3) ईश्वर अपने सार्वभौमिक-नैतिक नियमों द्वारा मानवजाति पर शासन करता है।

हम (श्रोता): हमने पढ़ा है कि देश-दुनिया में अक्सर किसी न किसी को देवी-देवता का साक्षात्कार होता रहा है। क्या साक्षात्कारी दैवी सत्य का प्रकटन भी ब्रह्मविज्ञान है?

डॉ. अंबेडकर (वक्ता): साक्षात्कारी दैवी सत्य का स्वेच्छा से प्रकटन का ‘ब्रह्मविज्ञान’ अलग है और इसे नैसर्गिक ब्रह्मविज्ञान से भिन्न किया जा सकता है, लेकिन यह भेद हमारे लिए महत्व नहीं रखता, क्योंकि साक्षात्कार की फलश्रुति बिना किसी परिवर्तन के नैसर्गिक ब्रह्मविज्ञान में होती है और मानवीय प्रयासों से जो ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता, उसे केवल उसके साथ जोड़ा जाता है अथवा नैसर्गिक ब्रह्मविज्ञान में ऐसा परिवर्तन होता है कि उसका संपूर्ण सत्य स्वरूप जब उसके सही साक्षात्कार को ध्यान में रखते हुए देखा जाता है, तब वह अधिक स्पष्ट और अधिक समृद्ध बन जाता है। लेकिन ऐसा भी एक मत है कि मूल नैसर्गिक ब्रह्मविज्ञान और मूल साक्षात्कारी ब्रह्मविज्ञान, दोनों में परस्पर विसंगति है। यहाँ उसकी चर्चा टालना उचित होगा, क्योंकि ऐसी चर्चा संभव नहीं है।

ब्रह्मविज्ञान के तीन सिद्धांत यानी ईश्वर का अस्तित्व, ईश्वर का विश्व पर दैवी शासन और ईश्वर का मनुष्य जाति पर नैतिक शासन, को ध्यान में रखते हुए मेरी मान्यता है कि ‘धर्म’ का अर्थ दैवी शासन की ‘आदर्श’ योजना का प्रतिपादन करना है। इसका उद्देश्य एक ऐसी सामजिक व्यवस्था बनाना है, जिसमें मनुष्य नैतिक जीवन व्यतीत कर सके। यह धर्म का पहला आयाम है। दूसरा आयाम है, धर्म जिस आदर्श योजना का समर्थन करता है, उसे जानना। किसी भी समाज के धर्म में स्थापित, स्थायी और प्रभावशाली अंग क्या हैं, उन्हें निश्चित करना और उनके आवश्यक गुणों को अनावश्यक गुणों से अलग करना। यह कभी-कभी बहुत कठिन होता है। संभवतः इस कठिनाई का कारण उस कठिनाई में छिपा हुआ है, जिसके बारे में दुनिया के कई चिंतक-विद्वान कहते हैं कि ‘‘धर्म की परंपरागत प्रथाओं में अनेक शताब्दियों में धीरे-धीरे वृद्धि हुई है और उसका मनुष्य की वैचारिक प्रकृति तथा उसके बौद्धिक और नैतिक विकास की प्रक्रिया के विभिन्न पहलुओं पर प्रभाव पड़ा है। ऐसा प्रतीत होता है कि आदिमानव से लेकर आज तक सभ्यता की प्रत्येक अवस्था में मूर्ति-पूजा वंशपरंपरा से उनके सभी मिश्रित संस्कारों और समारोहों के साथ चली आ रही है, लेकिन इस आधार पर ईश्वर के किसी भी रूप की कल्पना करना संभव नहीं। मानव जाति के धार्मिक विचारों का इतिहास, जिसे धार्मिक संस्थाओं ने साकार किया है, पृथ्वी के भौगोलिक इतिहास के समान ही है, जिसमें नवीन और प्राचीन को साथ-साथ अथवा एक तह पर दूसरी तह के समान रखा गया है।’’

हम (श्रोता): तो आपका कहना यह है कि धर्म उत्पत्ति और विकास ‘यूनिवर्सल फेनोनमेना’ है? इस मायने में हिंदू धर्म की उत्पत्ति और विकास की प्रक्रिया अद्वितीय नहीं? भारत में भी ऐसा ही हुआ?

डॉ. अंबेडकर (वक्ता): हां, भारत में ठीक ऐसा ही हुआ है।