मुद्दा

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'वीरता' सिर्फ सवर्णों की थाती नहीं

भारतीय इतिहास एक लंबा दौर उन शासकों का रहा है जो सवर्ण नहीं थे, लेकिन धीर-धीरे वर्ण व्यवस्था कायम हुई और यह रूढ हो गया कि शासन तो क्षत्रिय ही कर सकता है, क्योंकि ‘पृथ्वी को वीर ही भोगेगा’ और वीर तो क्षत्रिय ही है. गीता सहित तमाम धर्म ग्रंथों में यह बात ऐलानिया कहा गया है कि अध्यापन, पठन-पाठन का कार्य ब्राह्मण करेगा, युद्ध और अस्त्र-शस्त्र का परिचालन क्षत्रिय, वाणिज्य व्यापार वैश्य और सेवा कार्य शूद्र. अब अपने इस साजिशपूर्ण दिमागी खुराफात के लिए यह भी नियमन किया गया कि शूद्र यदि वेद-पुराण पढ़े तो उसके कंठ में जहर-तेजाब भर दो, वह अस्त्र-शस्त्र धारण करे तो उसका अंगूठा काट लो. उनके इन मूढता पूर्ण अवधारणाओं से अभिजात वर्ग के क्षुद्र स्वार्थ तो अनंतकाल से पूरे होते आ रहे हैं, लेकिन इस देश की अपूरणीय क्षति हुई. दो हजार वर्षों तक यह मुल्क बहुसंख्यक आबादी की मेधा और शक्ति से वंचित होने की वजह से गुलाम रहा. दुनियां में शायद ही कोई अन्य मुल्क इतने लंबे अरसे तक गुलाम रहा हो. विडंबना यह कि अपने द्वारा गढ़े इस मानसिक रूढ़ी का हम आज भी शिकार हैं. सहज मन से हम यह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं कि बहुसंख्यक आबादी जो सवर्ण नहीं, भी शौर्य और मेधा रखता है.

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‘शत्रु संपत्ति’ कानून बदलने की बेताबी!

वर्तमान सरकार ‘शत्रु संपत्ति’ कानून (Enemy Property Act, 1968) और Public Premises (Eviction of Unauthorised Ocupants Act, 1971) को नये सिरे से संशोधित करने और लागू करने की उतावली में है. इतनी कि संसद की अनदेखी कर अध्यादेश के जरिये ऐसा करना चाहती है. जनवरी 2016 में राष्ट्रपति के अध्यादेश से इसमें संशोधन कर दिया गया. फिर 9 मार्च ’16 को उक्त संशोधन का प्रस्ताव लोकसभा पारित हो गया. अगले ही दिन उसे राज्यसभा में रखा गया, जिसने इसे 15 मार्च को सलेक्ट कमेटी में भेज दिया. 16 मार्च को संसद स्थगित हो गयी. दो अप्रैल को पुनः इसके लिए एक अध्यादेश जारी हो गया. उसके बाद संसद का सत्र भी हुआ, लेकिन अधय्देश को उसमें पेश नहीं किया गया. 31 मई को तीसरी बार अध्यादेश जारी हुआ. पुनः 22 दिसंबर को पाँचवीं बार एक और अध्यादेश जारी हुआ. सरकार को इस बात की जानकारी देना भी जरूरी नहीं लगा कि आखिर उसे इतनी हडबडी क्यों है.

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जो आमजन का संविधान नहीं बन पाया

एक समय, जब बाबरी मस्जिद ऐक्शन कमेटी की सक्रियता अपने शबाब पर थी, और देश-भर में मंदिर-मस्जिद विवाद ने तनावपूर्ण आयाम ग्रहण कर लिया था, सैयद शहाबुद्दीन मेरे पटना निवास पर आकर मुझे अपनी तहरीक के राजनीतिक निहितार्थ समझाने लगे। बातचीत के दौरान, उन्होंने भारत के संविधान के कई अनुच्छेदों का हवाला दिया और यह साबित करने की कोशिश की कि भारतीय मुसलमानों की हैसियत ‘गई-बीती’ हो गई है। उनका कहना था, क़ानून और संविधान की संरचनाएं न तो उनकी जान की सुरक्षा कर रही हैं और न उनके मज़हब और तहज़ीब की। अपनी दलीलों के प्रति गंभीर रूप से ‘आग्रही’ होकर वो बार-बार अंग्रेज़ी में ‘मुस्लिम कल्चर’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर रहे थे।

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कहां गया हर साल एक करोड़ को नौकरी का वादा!

नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान यह वादा किया था कि सत्ता में आने पर उनकी सरकार हर साल 1 करोड़ लोगों को रोजगार मुहै ̧या करायेगी. लेकिन मोदी सरकार के 3 साल के दौरान रोजगार के जो आंकड़े प्रकाशित हुए हैं, उससे इस वादे की पोल खुल जाती है. हमारे देश की आबादी आज की तारीख में करीब 134 करोड़ हो गई है और इनमें से करीब 90 करोड़ लोग सक्षम कार्यबल में शामिल हैं. हर साल करीब 1.25 लाख कार्यसक्षम लोग तैयार होते हैं, जिनमें से केवल चार-सवा चार लाख लोगों को काम मिल पाता है. मोदी ने सत्ता में आने के बाद दावा किया कि इतने बड़े कार्यबल को उनकी सरकार ‘स्किल इंडिया के तहत निपुण बनायेगी और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को सफल करेगी. लेकिन उनकी ‘प्रधानमंत्री रोजगार सम्वर्द्धन योजना’ के तहत 2014-15 में केवल 3,57,502 बेरोजगारों को काम पर लगाया जा सका. 2015-16 के 8 महीनों में केवल 1,87,000 लोगों को रोजगार मिल सका.

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निर्भया फंड को खर्च करने में भी कोताही

2013 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने यूनियन बजट में 10 बिलियन के एक कारपस (फण्ड) की स्थापना की. इस तरह महिलाओं की सुरक्षा के लिए समर्पित एक कोष बनाया गया. महिला की सुरक्षा की दृष्टि से इस तरह के अनेक सकारात्मक फैसले हुए. लेकिन बीते लगभग पांच वर्षों में उन फैसलों पर अमल की सच्चाई देख कर तो यही कहा जा सकता है कि हमने ‘निर्भया हादसे’ से कुछ नहीं सीखा! सरकारी प्रशासन तंत्र ने उन फैसलों को जरा भी गंभीरता से नहीं लिया. निर्भया फंड एक उम्मीदों भरी पहल थी, जिसमें 2013 के बाद अभी तीन हजार करोड़ रूपये का फंड है. इस वर्ष, 2017 में इसमें काफी राशि आ चुकी है. मगर केंद्र व राज्य सरकारों में इसके इस्तेमाल के लिए न इच्छाशक्ति है, न ही कोई योजना है.

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सार्वजनिक बैंक हुए खस्ताहाल

साम्राज्यवाद के युग में बैकिंग व्यवस्था की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो जाती है और खासकर वित्तीय पूंजी के नागफांस में फंसी भारतीय अर्थव्यवस्था की गति को नियन्त्रित करने में यह एक निर्णायक भूमिका अदा करती है. एक तो हमारे देश के सार्वजनिक बैंकों की हालत पहले से ही खराब थी, दूसरे 8 नवम्बर, 2016 को की गई नोटबंदी ने इसकी हालत और भी खराब कर दी है. मोदी सरकार ने नोटबंदी के कई फायदे गिनाये थे, जैसे कालाधन एवं भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना, जाली नोटों का धंधा बंद करना, आतंकी फंडिंग रोकना, नगद रहित और पारदर्शी लेन-देन को बढ़ावा देना, आदि.अभी 30 अगस्त, 2017 को आरबीआई ने जो खुलासे किए हैं उससे ये सारे दावे तो खोखले साबित हो गए हैं, उपर से नोटबंदी से प्रभावित 500 और 1000 रुपये के नोटों को बैंकों में जमा करवाने के क्रम में कुल 120 लोगों को जान से हाथ भी धोना पड़ा है.

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पेशा चरित्र की गारंटी नहीं

जिस देश में आये दिन महिलाओं के शोषण के आरोप में एक संत पकड़ा जाता है, वहां कोई महिला किसी व्यक्ति पर आरोप लगाये, तो हम उनके प्रोफेशन के हिसाब से आंकते हैं कि कौन झूठा और कौन सच्चा! कोई व्यक्ति किस पेशे से जुड़ा है, क्या इससे उसका चरित्र तय होगा? कैसे हम किसी व्यक्ति के चरित्र की गारंटी उसके प्रोफेशन के हिसाब से दे सकते हैं? कैसे ये उम्मीद की जा सकती है कि किसी एक विभाग, क्षेत्र या संस्थान से सम्बद्ध लोग तो यौन शोषण कर ही नहीं सकते या वे सब एकदम सदाचारी पुरुष ही होंगे! जबकि हम देख रहे हैं कि धर्म, संस्कार, पाप-पुण्य की बात करने वाले लोग तक ऐसे ही आरोप में अभी जेल में हैं।

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प्रदूषण और तात्कालिक समाधान

भारत की कुछ शाश्वत समस्यायें हैं. जैसे, जनसंख्या की समस्या, भूखमरी की समस्या, भ्रष्टाचार की समस्या, प्रदूषण की समस्या आदि. अनगिनत. आजादी के बाद से ही इन समस्याओं की खबरें आती रही हैं और आगे भी आती रहेंगी. समस्या हो तो समाधान का प्रयास अवश्य होता है. हमारा प्रभु वर्ग किसी भी दल का हो, इन समस्याओं का हल ढ़ूढ़ने का प्रयास अवश्य करता है, लेकिन तातकालिक. समस्या का स्थाई समाधान हो जाये तो उनकी राजनीति ही समाप्त हो जायेगी. हर चुनाव में इन समस्याओं का उल्लेख हर दल अपने घोषणा पत्र में करता है. जीतने पर स्थाई समाधान के वादे भी होते हैं. चुनाव जीत कर सरकार बन जाने के बाद वे उन सारी सुविधाओं को भूल कर सत्ता का सुख भोगने लगते हैं. इस तरह समस्याओं को जिंदा रखा जाता है ताकि अगले चुनाव में काम आये.

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कृषि संकट बनाम किसान मुक्ति अभियान

हमारे देश भारत को एक ‘कृषि प्रधान’ देश कहा जाता है, क्योंकि 70 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है और कुल ग्रामीण आबादी के करीब 58 प्रतिशत लोगों की जीविका मुख्य रूप से कृषि एवं इससे जुड़े हुए धन्धे से चलती है। 2016-17 के आंकड़े के अनुसार कुल जीवीए, ग्रास वैल्यू एडेड, में कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्रों का योगदान 17.3 प्रतिशत है और ये क्षेत्र देश के कुल कार्यबल के 48.9 प्रतिशत हिस्से को रोजगार प्रदान करते हैं। गांवों में रहने वाले लोग पहले स्वावलंबी थे, लेकिन ब्रिटिश राज के दौरान इस फलती-फूलती ग्रामीण अर्थव्यवस्था को काफी हद तक तबाह कर दिया गया। 1947 के बाद जब भारतीय शासक सत्ता पर बैठे तो इन्होंने न केवल प्राक- पूंजीवादी भूमि सम्बन्ध को कायम रखा, बल्कि कृषि विकास की पूंजीवादी-साम्राज्यवादी नीतियों पर अमल किया। विगत 70 सालों के दौरान विभिन्न दलों एवं गठबंधनों की सरकारें केन्द्र व राज्यों में सत्तासीन हुई और उन्होंने भूमि सुधार एवं कृषि विकास की ढेर सारी योजनाएं चर्लाइं । यहां तक कि उन्होंने कृषि एवं ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के नाम पर इन्द्रधनुषी क्रान्ति यानी हरित, श्वेत, नीली, पीली आदि क्रांतियों, को सफल करने के दावे भी किए। लेकिन सच्चाई यह है कि कृषि एवं ग्रामीण विकास की जो नीतियां अपनाई र्गइं, उनसे पूरा कृषि क्षेत्र संकटग्रस्त और खेती-किसानी घाटा के धन्धे में तब्दील हो गया।

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महिला सुरक्षा के खोखले दावे

भारत में महिला सुरक्षा को लेकर एक सर्वेंक्षण हुआ जिसको महिला बाल कल्याण मंत्रालय ने प्रकाशित किया. इस सर्वेक्षण के अनुसार महिला सुरक्षा की दृष्टि से सबसे सुरक्षित राज्य गोवा है. उसके बाद केरल और मिजोरम का स्थान है. महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित राज्यों में सबसे निचले पायदान, तीसवें स्थान पर बिहार है, 29 वें सथान पर उत्तर प्रदेश, 28 वें स्थान पर दिल्ली तथा 27 वें सथान पर झारखंड आता है. इस सर्वेंक्षण में महिला की सुरक्षा को केवल हिंसा से ही नहीं आंक कर तीन अन्य मुद्दों को भी ध्यान में रखा गया है. शिक्षा, स्वास्थ, गरीबी और महिला हिंसा के विरुद्ध प्राप्त सुरक्षा. ये चार आधार बने इस सर्वेक्षण के. स्त्री की शिक्षा, स्वास्थ, गरीबी तथा उसके हिंसा के अनुपातों के द्वारा राज्यों का स्थान निश्चित किया गया है. इन सारे मुद्दों के कुल अनुपात को जीरो से एक अंक के एक स्केल पर नापा गया. जो राज्य इस स्केल के नंबर एक के जितना समीप रहा, उसका स्थान क्रमशः निश्चित होता गया. जैसे, गोवा औरतों की सुरक्षा के मामले में अव्वल रहा, शिक्षा में पांचवे स्थान पर, स्वास्थ में छठे स्थान पर और गरीबी में आठवें स्थान पर. इस तरह वह स्त्री सुरक्षा के लिहाज से अव्वल रहा.

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राजनीति में पिटते आदिवासी

यह सवाल बहुतों के जेहन को मथने लगा है कि झारखंड की सबसे बड़ी आबादी होते हुए भी आदिवासी राजनीति में पिट क्यों रहा है? जबकि यह बात सामान्य समझ कि है कि राजनीति में पिटने का अर्थ ‘अपने देश में, दूसरों का राज’ होना होगा. और यह कहने से काम नहीं चलेगा कि आदिवासी भोला—भाला होता है और दूसरे उसे ठग लेते हैं. यह भी समझने की जरूरत है कि सिर्फ ‘जय झारखंड’ कहने से झारखंड की जय नहीं होने वाली, बस हम इस भ्रम में रहते हैं कि ‘जय झारखंड’ बोलने से झारखंडियों की जय होगी. जबकि सच हमारे सामने है. जिस भाजपा ने झारखंड आंदोलन के दबाव में आकर झारखंड अलग राज्य बनने के पहले संगठनात्म दृष्टि से ‘वनांचल प्रदेश’ का गठन किया था, जिस भाजपा ने अलग राज्य बनने के बाद आदिवासी मुख्यमंत्री बनाया और कई वर्षों तक चलाया, उसी भाजपा ने अब एक गैर आदिवासी मुख्यमंत्री बनाया और निकट भविष्य में उसका कोई इरादा नहीं कि झारखंड में आदिवासी मुख्यमंत्री बनाये.

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नर्तकी होने की त्रासदी

दिल्ली की लोकगीत गायिका तथा नर्तकी हर्षिता दहिया को उसके बहन के पति ने गोली मार कर हत्या कर दी, क्योंकि हर्षिता ने उस पर बलात्कार का आरोप लगाया था. इसी तरह कुछ वर्ष पहले कुलबिंदर कौर नामक नर्तकी की हत्या उस समय हुई जब वह किसी शादी के समारोह में मंच पर नाच रही थी. सपना चौधरी भी एक ख्याति प्राप्त स्टेज डांसर है, जिसको ‘बिग बाॅस’ जैसे शो में भी जगह मिली थी, ने आत्महत्या करने की कोशिश की. क्योंकि, सोशल मीडिया में उसे लेकर बहुत ही भद्दे ढंग से लिखा गया था. सपना हरियाणा के एक मध्यवर्गीय परिवार से आई हुई लड़की है. पिता की मृत्यु के बाद परिवार के भरण— पोषण के लिए उसने नृत्य का पेशा अपनाया. ‘साॅलिड बाॅडी’ गाने पर नृत्य कर उसने बहुत कम समय में ख्याति पाई. यू ट्यूब पर उसके वीडियो को देखने वाले लाखों में हैं. पटना की सोनू सोनी की भी यही कहानी है. स्टेज पर ठुमके लगा कर अर्जन करना.

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स्वच्छता अभियान और मोदीजी के ‘सद्विचार’

कोई संदेह नहीं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश में साफ़-सफाई का माहौल बनाने का भरपूर प्रयास कर रहे हैं. कितने सफल हुए हैं, कहना कठिन है. हालांकि पूरी सरकारी मशीनरी झोंक दी गयी है, सत्ता पक्ष से जुडे सारे संगठन, राज्य सरकारें, और विभिन्न निजी संस्थाएं व कारपरेट जगत (शायद प्रधानमंत्री की नजरें इनायत पाने के लिए भी) और स्कूल-कालेज इस काम में लगे हुए हैं. चैनलों और अखबारों में बैनर लगा कर झाडू अभियान के फोटो चमक रहे हैं. पर अफसोस कि अब तक यह जन-अभियान का रूप नहीं ले सका है. जरा किसी शहर के आम मोहल्लों की हालत देख लें, पता चल जायेगा. सरकारी/गैरसरकारी अधिकारी-कर्मचारी फोटो चाहे जितना खिंचा लें, सफाई नहीं कर सकते. इसलिए कि यह उनके सहज संस्कार में नहीं है. और सदियों का यह संस्कार बदलने का न तो प्रयास हो रहा है, न यह इतना आसान है. ऐसे में यह सारा अभियान सरकार और मोदी की छवि चमकाने का अभियान जैसा बनता जा रहा है. खुद श्री मोदी भी मान चुके हैं कि हजारों गांधी और लाखों मोदी से भी यह काम नहीं होगा, जब तक आम आदमी की भागीदारी इसमें न हो. दूसरी ओर आज भी कहीं कहीं सर पर मैला ढोने की प्रथा जारी है; आये दिन सेप्टिक टैंक साफ़ करने के दौरान सफाईकर्मियों की मौत की ख़बरें आती रहती है; और सरकार की कोई प्रतिक्रिया तक नहीं मिलती. जाहिर है, लाखों की बात तो दूर, ‘एक भी’ मोदी सफाई के असल महत्व को नहीं मानता.

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स्वच्छता सम्बन्धी गांधी के विचार

  • 1920 में गांधीजी ने गुजरात विद्यापीठ की स्थापना की. यह विद्यापीठ आश्रम की जीवन पद्धति पर आधारित था, इसलिए वहां शिक्षकों, छात्रों और अन्य स्वयं सेवकों और कार्यकर्ताओं को प्रारंभ से ही स्वच्छता के कार्य में लगाया जाता था. यहां के रिहायशी क्वार्टरों, गलियों, कार्यालयों, कार्यस्थलों और परिसरों की सफाई दिनचर्या का हिस्सा था. गांधीजी यहां आने वाले हर नये व्यक्ति को इस संबंध में विशेष पढ़ाते थे। यह प्रथा आज भी कायम है.
  • कई लोगों ने गांधीजी को पत्र लिखकर आश्रम में उनके साथ रहने की इच्छा जाहिर की थी. इस बारे में उनकी पहली शर्त होती थी कि आश्रम में रहनेवालों को आश्रम की सफाई का काम करना होगा, जिसमें शौच का वैज्ञानिक ढंग से निस्तारण करना भी शामिल है. गांधीजी ने हमारा ध्यान इस ओर खींचा… 21 दिसंबर 1924 को बेलगांव में अपने नागरिक अभिनंदन के जवाब में उन्होंने कहा था, ‘हमें पश्चिम में नगरपालिकाओं द्वारा की जाने वाली सफाई व्यवस्था से सीख लेनी चाहिए…पश्चिमी देशों ने कोरपोरेट स्वच्छता और सफाई विज्ञान किस तरह विकसित किया है, उससे हमें काफी कुछ सीखना चाहिए…’ (गांधी वाङ्मय, भाग-25, पृष्ठ 461)
  • जोहांसबर्ग (दक्षिण अफ्रीका) के आस-पास के क्षेत्र में सोने की खादानों वाले इलाके में प्लेग फैला था. गांधीजी ने अपनी पूरी शक्ति के साथ, स्वेच्छा से और स्वयं के जीवन को खतरे में डालकर रोगियों की सेवा की. नगर चिकित्सक और अधिकारियों ने गांधीजी की सेवाओं की बहुत तारीफ की. गांधी जी चाहते थे कि लोग उस घटना से सबक लें. उन्होंने एक जगह लिखा था : ‘…हमें स्वच्छता और सफाई का मूल्य पता होना चाहिए…गंदगी को हमें अपने बीच से हटाना होगा…क्या स्वच्छता स्वयं ईनाम नहीं है?’ (गांधी वाङ्मय, भाग-4 पृष्ठ 146)।
  • गांधीजी ने भारतीय समाज में सफाई करने और मैला ढोने वालों द्वारा किये जाने वाले अमानवीय कार्य पर तीखी टिप्पणी की. उन्होंने कहा- ‘हरिजनों में गरीब सफाई करने वाला या ‘भंगी’ समाज में सबसे नीचे खड़ा है जबकि वह सबसे महत्वपूर्ण है. अपरिहार्य होने के नाते समाज में उसका सम्मान होना चाहिए… जो काम एक भंगी
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बुराई पर अच्छाई की जीत!

मैं बुराई पर अच्छाई की जीत वाली कहानी को सच नहीं मान सकता. बुद्धि से और आंख खोल कर बिना भावुक हुए देखते हैं तो साफ़ दिखाई दे जाता है कि झगड़ा तो नस्लों के बीच में था. अगर आप एक ही नस्ल का बताया हुआ वर्णन सुनेंगे तो आपको उसमें दूसरी नस्लों के बारे में गलत और भ्रामक बातें बताई जायेंगी, क्योंकि आपका इतिहास जीतने वाले का इतिहास है इसलिए जो हार गया उसे बुरा कहा गया और आपने खुद के लोगों को अच्छा कहा. जीत और हार से अच्छे बुरे का फैसला नहीं होता क्योंकि अच्छे भी हारते हैं और बुरे भी जीत जाते हैं. हम बहुत समय से अपनी जीत और दूसरों की हार का जश्न मनाते रहे हैं और उन्हें हम अपना त्यौहार कहते हैं, लेकिन जब तक हमारे पास सत्ता थी और पैसा था और हम अलग अलग रहते थे तब तक तो इसे किसीने चुनौती नहीं दी, लेकिन अब लोकतंत्र आ गया है. अब सभी नस्लों के लोग एक साथ साथ रहने लगे हैं. अब सबके अधिकार भी बराबर मान लिए गये हैं. संविधान लागू होने के बाद अब दूसरी हारी हुई नस्लें भी पढ़ लिख रही हैं पैसा कमा रही हैं. अब यह हारी हुई नस्लें अपना इतिहास खोज रही हैं. असुर, राक्षस, दानव जातियां खोज ली गई हैं. यह सभी आदिवासी लोग हैं. यह भी खोज हुई है कि शुरू में यज्ञ जंगल जला कर घास के मैदान और बस्तियां बसाने को कहा जाता था. आर्यों के इस यज्ञ की अग्नि को आदिवासी यानी असुर बुझा देते थे क्योंकि आदिवासी जंगलों पर आश्रित थे.

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यौनिक हिंसा और उस से जुड़े आयाम

युवाओं के साथ सत्र यौनिक इच्छाएं, फिल्म (अनारकली ऑफ़ आरा) शो के बाद यौनिकता और हिंसा को कैसे साथ में देखते हैं, इन सत्रों के आधार पर चर्चा व स्तरों के माध्यम से ओवर आल यूथ के सन्दर्भ में समझ आया कि किस किस तरह की स्थिति बनती है,जैसे युवाओं का कहना था कि जब बहुत मन बढ़ने लगता है तो गुस्सा भी आता है. बड़ी मुश्किल से मौका मिलता है, लड़की अगर मना कर देती है तो गुस्से में लगता है- सब कर डालो. जैसे ज्यादा दिल हुआ करने का, फिर जिससे प्यार भी नहीं है, तो शादी में गये हैं या रिश्तेदारों के यहाँ अगर मौका मिलता है तो कर लेते हैं. इसी तरह लडकी कहती है कि जब लड़कों के साथ मिलते हैं दोस्ती में या बॉय फ्रेंड से भी,तो प्यार (सेक्स) की बातें करने का मन होता है. देर देर तक मिलने, इकट्ठे साथ रहने का टाइम नहीं होता, तो लड़के तो बस अपना काम कर के निकल जाते हैं. तब बहुत गुस्सा आता है, जब वह पूछता भी नहीं कि अपना क्या मन था, बिना पूछे चुम्मी ले ले तो, यदि शादी में साथ में जा रहे हैं, तो युवा लड़कों का कहना था कि पता नहीं लडकियों का क्या क्या चलता रहता है; कभी मूड बना के आये हैं, उनको नींद आती है तो ज़बरदस्ती भी कर लेते हैं. फिल्म देखते देखते मूड हो गया तो भी कर लेते हैं. अगर बहुत दिनों से मन में चल रहा है- सीने (स्तनों ) को छूकर देखना है तो फिर ग्रुप में जा रहे होते हैं, लड़की अकेली जा रही है, सुनसान जगह है, तो दबा देते हैं.

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जाति व्यवस्था: कम्युनिस्टों की दुविधा, संघर्ष

कम्युनिस्ट आन्दोलन में शुरू से ही जाति प्रश्न को लेकर गम्भीर मतभेद रहे हैं. हालाँकि 1930 में सी.पी.आई.ने भारतीय समाज में जाति व्यवस्था के महत्त्व को समझा और ‘फोरम फाॅर एक्शन’ शीर्षक प्रस्ताव में ‘छुआछूत व जाति व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष को कृषि क्रान्ति और साम्राज्यवादी शासक विरोधी संघर्ष से जोड़ने’ का आह्वान किया, लेकिन आगे चलकर उसने कृषि क्रान्ति व साम्राज्यवाद विरोधी मुकम्मल संघर्ष से ही अपना नाता तोड़ लिया. बी.टी.रणदिवे, जिन्होंने ‘जाति व वर्ग’ के अन्तरसम्बन्धों को स्पष्ट करने के लिए एक पुस्तिका लिखी, के विशेष प्रयास से सी.पी.आई.एम. ने 1980 के दशक के अन्त में ‘सामन्ती तथा अर्ध-सामन्ती विचारधाराओं के खिलाफ लड़ाई को

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जाति व वर्ग के पेंच

प्रायः सभी प्रबुद्ध नृजातिविज्ञानियों, समाजशास्त्रिायों व मार्क्सवादी विचारकों का मानना है कि सामन्ती उत्पादन प्रणाली के विकास की प्रक्रिया में कबीलाई समूहों का लगातार जबरन सादृशीकरण किया गया,फिर शोषण पर आधारित एक कृषि अर्थव्यवस्था का आविर्भाव हुआ, जिसमें जातीय विभाजन ठोस स्वरूप ग्रहण कर लिया और उत्पादन में शूद्र जातियों के श्रम की भूमिका प्रमुख हो गयी. इस प्रकार एक सरल आदिम अर्थव्यवस्था का अपेक्षाकृत एक जटिल,श्रम अधिशेष की लूट पर आधारित कृषि आधारित सामन्ती अर्थव्यवस्था में रूपान्तरण हो गया.अपने शोषण व लूट को बढ़ाने के लिए सामन्ती प्रभुओं ने न केवल कबीलाओं की संस्कृति/रीति-रिवाज व वर्जनाओं पर हमला किया, बल्कि युद्ध के जरिये उन्हें अधीन करने/गुलाम बनाने का भी अभियान चलाया.निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि जाति व्यवस्था का उद्भव सामन्तवाद व शोषक कृषि व्यवस्था के विकास के साथ काफी निकटता के साथ जुड़ा हुआ है. इस व्यवस्था में मुट्ठीभर सामन्तों का जमीन व राजसत्ता पर नियंत्रण होता है और व्यापक जनता को गुलामी की जिन्दगी नसीब होती है. सामन्ती ताकतें विशाल जन समुदाय के श्रम को लूटने के लिए न केवल जाति व्यवस्था का इस्तेमाल करती हैं,बल्कि धार्मिक दर्शनों व कर्मकांडों का भी सहारा लेती हैं. साथ ही साथ, पितृसत्ता को स्थापित व इस्तेमाल कर महिलाओं को गुलामी की जंजीर में जकड़ा जाता है और उन पर तरह-तरह के अत्याचार किये जाते हैं. जाति व्यवस्था न केवल कृषि कार्यों को सम्पन्न करने के लिए विभिन्न प्रकार के श्रमिक समूहों को मुहैया करती है, बल्कि सामन्तों की ग्राम सत्ता व राजसत्ता को बरकरार रखने में भी मददगार साबित होती है.

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सड़कें और हम औरतें

बीते माह चार अगस्त को देर रात चंडीगढ़ में वर्णिका कुंडू नामक युवती का पीछा किये जाने और उसके अपहरण की कोशिश के बाद एक बार फिर लड़कियों को तरह तरह की नसीहतें दी गयीं. हमेशा की तरह कहा गया कि उसे रात में बाहर निकलने की क्या जरूरत थी. इसके जबाब में स्वतंत्रचेता स्त्रियों ने ‘अपनी सड़कें’ नाम से एक अभियान चलाया जिसमे 12 अगस्त की रात दिल्ली मुंबई कोल्कता चंडीगढ़ पंचकुला जयपुर लखनऊ कानपुर रायपुर जैसे कई छोटे बड़े शहरों में लड़कियां/औरतें सड़कों पर निकलीं, यह अभियान अभी भी जारी है, ऐसे कई शहरों में जहां 12 अगस्त को किसी कारण यह कार्यक्रम नहीं हो पाया था वहाँ बाद में भी इसी थीम पर कार्यक्रम हो रहे हैं. यह एक कोशिश है यह बताने की कि औरतों को भी सड़कों पर चलने का हक है. आज की बदलती परिस्थितियों में ऐसे अभियान की जरूरत भी है. इसलिए कि सड़क पर औरतों का हक हमेशा से ‘किंतु-परंतु’ और संदेह के साथ ही रहा है. और रात में तो बिलकुल नहीं, वहां तो कोई दुविधा ही नहीं है. इसी संदर्भ में अनायास मेरी नजर कुछ वर्ष पहले लिखे सड़क से जुडे एक संस्मरण पर पड़ी, जो आज भी प्रासंगिक है :

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काला अगस्त

अगस्त के महीने का भारतीय इतिहास में बहुत महत्व है. 9 अगस्त 1942 के दिन अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन शुरु हुआ था. इसे आज भी अगस्त क्रांति के रूप में याद किया जाता है. इसी अगस्त क्रांति के फलस्वरूप 15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी मिली. अंग्रेजों ने विखंडित भारत ही सही भारतीय को सौंप अपने देश लौट गये. आज हम 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के रूप में घूमधाम से मनाते हैं. तिरंगे लहराये जाते हैं. राष्ट्रीय गान गा कर हम देश प्रेम च्यक्त करते हैं. स्कूल कालेज कार्यालयों में छुट्टी रहती है और लोग आजादी के महत्व को भले ही न समझें, लेकिन जश्न जरूर मनाते हैं. दो हजार 17 का अगस्त का महीना भी कई तरह की घटनाओं परिघटनाओं के कारण त्रासद और अविस्मरणीय बन गया. अगस्त माह के प्रारंभ में ही चंडीगढ की वर्णिका ने रात के बारह बजे सड़क पर अपना बचाव किया प्रतिष्ठित घरों के मदांध लड़कों से. उसके साथ ही उसने एक बार फिर इस बहस को खड़ा कर दिया कि रात में सड़के लड़​कियों के लिए क्यों सुरक्षित औश्र उपयोगी नहीं हैं. इस घटना में फिर एक बार लड़की को ही अपराधी बनाया गया. आजादी के 70 वर्ष बाद भी औरत की आजादी अधूरी ही नहीं, शर्तों में सीमित है.

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मुस्लिम महिलाओं से ज्यादा कट्टर हिंदू खुश!

इंस्टैंट ट्रिपल तलाक़ पर ये सुप्रीम कोर्ट का फैसला आफरीन और सलीमा जैसी तमाम महिलाओं की जीत है जो इसके ख़िलाफ़ लड़ी और जीतीं. वो इस जीत के लिए बधाई की पात्र हैं. हर किसी को अपने अधिकारों के लिए जरूर लड़ना चाहिए और बाकी सबको उनका सपोर्ट करने चाहिए. पर जैसा हमेशा होता है, महिलायें अकेले के दम पर लड़ाई शुरू करती हैं और जीतती हैं, इस केस में भी ऐसा ही हुआ, पर अब इसका क्रेडिट हर कोई लेना चाह रहा है. चाहे वो राजनैतिक दल या अन्य लोग. जीत के बाद वही लोग अब उन महिलाओं के सपोर्टर बन गए जो इनकी लड़ाई में कभी साथ थे ही नहीं, चाहे वो मुस्लिम दल हो या गैर मुस्लिम. अब ये जीत सबके लिए एक ऐतिहासिक जीत हो गयी, चाहे वो कितने भी एक दूसरे के खिलाफ हों. गैर मुस्लिमों के लिए के लिए मुस्लिम महिलाओं की दिक्कतें अब अचानक इतनी महत्वपूर्ण हो गयी, जबकि उनकी अपने वर्ग से जुड़ी महिलाओं की दिक्कतों के समय ना तो इनको मानवाधिकार की बात याद आती है, ना ही इनकी सोच इतनी अच्छी हो पाती, पर इस मुद्दे पर ये अचानक से इतने बड़े फेमिनिस्ट बन जाते हैं.

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किसी का घनश्याम दास बन जाना

घनश्याम दास जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय (JNU) के अन्य छात्रो की ही तरह एक सामान्य छात्र था. वह भी रोज क्लास जाता था. लाइब्रेरी जाता था. पढ़ता लिखता था. लेकिन अचानक से लोग उसे पागल कहने लगें, यूनिवर्सिटी जहाँ वो पढ़ता था के अधिकाश लोग भी पागल मानना शुरू कर दिया. नए नामांकन वालो बच्चों का उससे परिचय ही इस रूप में हुआ. इन सबका अंत 20 अगस्त 2017 को उसके मौत के साथ हुई. यूनिवर्सिटी ही क्यों पुरे समाज के साथ-साथ उसके परिवार वालों ने भी उसका साथ छोड़ दिया था. इस प्रकार अगर किसी ने उसे फिर भी जगह दी थी तो वह उसका यूनिवर्सिटी ही था, वह उसका JNU ही था, जिसे वह अपना घर मान चुका था. और उसी परिसर में उसकी मौत हुई.

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चिकित्सा व्यवस्था ही बीमार

कहाँ तो जब हमारे उत्तर प्रदेश में भाजपा प्रचण्ड बहुमत के साथ सत्ता में आई तो लोगो ने यह कहना शुरू कर दिया कि अब रामराज आ गया. लेकिन कितना रामराज है ये आये दिन होने वाली घटनायें बखूबी बयान करती है,चाहे वो महिलाओं के साथ होती उत्पीड़न की घटनायें हों, या अभी हाल में हुआ गोरखपुर कांड. जिस देश मे गाय तक के लिए एम्बुलेंस की बात होती है, वहां के अस्पतालों औऱ वहां मिलने वाली सुविधाओं से तो हमे बहुत ही ज्यादा उम्मीद होनी चाहिए. लेकिन असलियत क्या है, ये किसी भी सरकारी अस्पताल में घुसते ही पता चल जाता है. वहाँ मिलने वाली सुविधाएं कितनी पर्याप्त होती हैं, ये सबको बहुत अच्छे से पता है.

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डबल डोमेसाईल का मामला

अभी मेडिकल प्रवेश परीक्षा ‘नीट’ का रिजल्ट आया है. छानबीन में पता चला कि 86 अभ्यार्थी एक साथ बिहार और झाऱखंड दोनों राज्यों से उत्तीर्ण हुए है. कुछ लोग सोच रहे है कि यह कैसे संभव है? आपलोगों को भी यह जानना चाहिए कि झाऱखंड में लाखों लोग ऐसे हंै जिनके पास झारखंड का भी वोटर कार्ड है. और बंगाल, बिहार और यूपी का भी. यह कोई नई बात नहीं है और न ही किसी से छुपा हुआ है. रघुवर सरकार से पहले भी फर्जी तरीके से आवासीय प्रमाण पत्र बनता था, लेकिन इतनी आसानी और धडल्ले नहीं बनता था.और न ही लोग बनवाने की हिम्मत करते थे. यदि कोई कही कमाने खाने के लिए जाना चाहे, तो उसे भारत का संविधान भी नहीं रोकता है. सबको रहने खाने और जीने का अधिकार है. कहीं जाएं, कहीं रहें.

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पूर्ण बहुमत मिलते ही बौरा गई भाजपा

झारखंड के आदिवासी मूलनिवासि हमेशा से संतोषप्रिय रहे हैं.अपने राजनैतिक सामाजिक सांस्कृतिक,शैक्षणिक आर्थिक और धार्मिक अधिकार के लिए कभी भी बहुत अधिक सजग नही रहे हैं. नतीजतन सी एनटी एसपीटी जैसे सशक्त कानून रहने के बावजूद धीरे— धीरे बिहारी साम्राज्यवाद के चंगुल मे फंसते गये. सीएनटी एसपीटी कानून चुहाड विद्रोह की परिणति थी. चुहाड विद्रोह से अंग्रेज आवाक थे. उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि भूखे, नंगे लोग जिनके तन पर ढंग का कपड़ा नहीं,अनपढ़ गंवार जैसे लोगो मे आखिर कोन सी ऐसी प्रेरणाशक्ति है जिसके सहारे बंदूकधारी अंग्रेज सैनिक के साथ भिड़ने में कोई डर नहीं. काफी शोध के बाद उन लोगों ने महसूस किया कि झारखंड के मूलनिवासी भले ही आर्थिक हित के प्रति सजग न हो, पर सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक अतिक्रमण के प्रति काफी संवेदनशील हैं. झारखंड के मूलनिवासियो के इसी खासियत की सुरक्षा के लिए तथा भावि विद्रोह की संभावना को समाप्त करने के लिए ही सीएनटी — एसपीटी जैसे सशक्त कानून बनाये गये, ताकि झारखंडियो को सांस्कृतिक, सामाजिक तथा धार्मिक अतिक्रमण से सुरक्षित रखा जा सके. यह कानून झारखंड में बाहरी आबादी के अतिक्रमण को काफी मुश्किल बनाती है. यही वजह है कि सीएनटी एसपीटी कानून हमेशा से बाहरी आबादी की आंखों की किरकिरी बनी रही. संयुक्त बिहार में थोड़ा बहुत परिवर्तन किया गया था, पर मूल आत्मा से छेड़छाड़ करने की हिम्मत किसी ने नहीं की. पर झारखंड में संघ की संतान भाजपा को जैसे ही पूर्ण बहुमत मिला, बस वे बौरा गयी. विकास के नाम पर सीएनटी एसपीटी मे ऐसा बदलाव किया गया कि अब केवल इस कानून का खोल ही बचा है,आत्मा निकाल दी गई हैं. भाजपा ने महसूस कर लिया था कि झारखंड के तथाकथित भूमिपुत्र नेतृत्व, पद, पैसा और पावर के लिए झारखंडियो का हक अधिकार तो छोडिए, आपनी बहु बेटी की इज्जत तक को दाव में लगा सकते हैं. बस, इसी कमजोरी का फायदा भाजपा उठा लेना चाहती है, क्योंकि पता नहीं फिर ऐसी अनुकूल परिस्थिति झारखंड में भाजपा को मिले न मिले.

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संवैधानिक प्रमुख के चयन में दलित कार्ड!

भाजपा ने राष्ट्रपति पद के लिए एक दलित रामनाथ कोविंद को अपना प्रत्याशी बनाया है. विपक्षी दलों से बातचीत की बात तो हुई पर, सत्ता पक्ष ने किसी नाम का सुझाव देकर सहमति बनाने का प्रयास किये बिना अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया. इसे ‘मास्टर स्ट्रोक’ कहा गया, जिससे विपक्ष हतप्रभ रह गया. ‘दलित’ प्रत्याशी होने से विरोधी दलों में भी फूट पड़ गयी. कहा जा रहा है कि इस तरह भाजपा ने अपना दलित प्रेम दिखाया है. कुछ लोगों का मानना है कि दलितों का वोट बटोरने के लिए किया जा रहा है. खास कर अगले वर्ष गुजरात में होनेवाले विधानसभा चुनाव की दृष्टि से. इस संदर्भ में एक बात यह भी सामने आयी है कि भाजपा प्रत्याशी रामनाथ कोविंद जिस कोली समुदाय से आते हैं, वह गुजरात में एक बडी आबादी या वोट बैंक है. वहां वह अनुसूचित जाति नहीं, ओबीसी की श्रेणी में है, जबकि यूपी में दलित। इस तरह मोदी-शाह की जोडी ने एक साथ दो निशाने साधे हैं. एक तो देश के स्तर पर एक दलित को राष्ट्रपति पद पर आसीन कराने का श्रेय, दूसरी ओर गुजरात के कोली समुदाय को साथ लाने का उपक्रम! और 2019 में होनेवाले संसदीय चुनाव के मद्देनजर ‘अपना’ राष्ट्रपति होने के अपने फायदे तो हैं ही, जो शायद विपक्षी दलों की सहमति से सर्वसम्मत उम्मीदवार ढूँढने से नहीं मिलता.

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यथार्थ की कसौटी पर स्टेशनों का निजीकरण

केंद्र की मोदी सरकार देश के 23 रेलवे स्टेशनों के आधुनिकीकरण के लिए उन्हें निजी हाथों में देने जा रही है. इससे सरकार को कम से कम चार हजार करोड़ का राजस्व मिलने का अनुमान है. केंद्र सरकार की योजना सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) के तहत देश के 400 रेलवे स्टेशनों को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाने की है. रेलवे पुनर्विकास कार्यक्रम नाम की इस योजना के तहत सरकार को एक लाख करोड़ रुपये का निवेश मिलने की उम्मीद है. इसके पहले चरण में 23 स्टेशनों को नीलामी के लिए चुना गया है. इन स्टेशनों में कानपुर सेंट्रल, इलाहाबाद, उदयपुर, हावड़ा, मुंबई सेंट्रल, चेन्नई सेंट्रल, फरीदाबाद, भोपाल और इंदौर शामिल हैं. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक नीलामी के लिए कानपुर सेंट्रल स्टेशन का बेस प्राइस 200 करोड़ और इलाहाबाद का 150 करोड़ रुपये रखा गया है.

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आदिवासियों को विकास का भागिदार बनाईये

टी.वी. पर एक विज्ञापन आता है जिसमें एक सैनिक जब बस में चढता है तो बस में बैठे सारे यात्री उसको सैल्यूट करते हैं। शायद सबने देखा होगा यह विज्ञापन । बेहद ही भावुक । ऐसा होना भी चाहिए हमें । हमेशा अपनी सेना के जवानों के लिये गर्वित और आभारी भी ।वो हमारे देश का गौरव हैं. वे हैं तभी हम हैं। हम सब गर्व करते हैं उन पर। लेकिन जो हमारी सुरक्षा के लिए अपने घर परिवार से इतनी दूर, अपनी ड्यूटी पर है। चाहे वो कश्मीर में हों या छत्तीसगढ़, उनकी जान, उनकी इज्जत का क्या?? दोनों ही स्थिति में हमारी सरकार की तरफ से, चाहे मौजूदा सरकार हो या कोई पहले की, सिर्फ निंदा से ज्यादा कुछ भी क्यों नहीं? आये दिन हम सब सेना के जवानों के शहीद होने की खबरें सुनते हैं, धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर में । कभी तो वो शहीद होते हैं बाहर से घुसे आतंकवादियों की वजह से और कभी हमारे ही देश में पनपे नक्सलियों से। और उसके बाद हमारे राजनेताओं की तरफ से की जाने वाली कार्रवाई होती है सिर्फ कड़ी निंदा,उन आतंकवादियों या नक्सलियों की।